रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में आदिवासी वोट बैंक हमेशा सत्ता की सबसे अहम कड़ी माना जाता रहा है। प्रदेश की कुल आबादी में आदिवासी समाज की हिस्सेदारी करीब 32 प्रतिशत है, जबकि 90 विधानसभा सीटों में से 29 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में हर चुनाव में आदिवासी मतदाताओं का रुख सत्ता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अमरजीत भगत ने अपनी ही पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज ने कांग्रेस को खुलकर समर्थन दिया था, लेकिन सरकार बनने के बाद आदिवासी समाज और कांग्रेस सरकार के बीच दूरी बढ़ने लगी। उनके मुताबिक इसी स्थिति का फायदा भारतीय जनता पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में मिला।
पूर्व मंत्री ने यह भी कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी आदिवासी समाज और सरकार के बीच वैसी ही दूरी दिखाई दे रही है। उन्होंने संकेत दिए कि यदि सरकार और आदिवासी समाज के बीच संवाद मजबूत नहीं हुआ, तो इसका राजनीतिक असर भविष्य में देखने को मिल सकता है।
अमरजीत भगत के इस बयान के बाद भाजपा को कांग्रेस पर हमला बोलने का मौका मिल गया। भाजपा प्रदेश महामंत्री नवीन मार्कंडय ने कहा कि कांग्रेस की वास्तविकता अब उसके अपने नेता ही उजागर कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल दिखावे के लिए अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति वर्ग के हितों की बात करती है, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति अलग रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में आदिवासी वोट बैंक एक बार फिर सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल आदिवासी समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर प्रदेश की सियासत और तेज हो सकती है।



