आज 17 मई से अधिकमास यानी पुरुषोत्तम मास की शुरुआत हो गई है, जो 15 जून तक चलेगा। हिंदू धर्म में इस महीने को बेहद पुण्यदायी और आध्यात्मिक साधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दौरान किए गए जप, तप, दान और पूजा-पाठ का फल कई गुना बढ़ जाता है।
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क्यों पड़ता है अधिकमास?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, चंद्र कैलेंडर लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर कैलेंडर 365 दिनों का। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए लगभग हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है। इसका उद्देश्य त्योहारों और ऋतुओं के बीच तालमेल बनाए रखना है।
भगवान विष्णु की भक्ति का विशेष महत्व
अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय महीना माना गया है। इस दौरान श्रद्धालु विष्णु सहस्रनाम का पाठ, सत्यनारायण कथा और “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई भक्ति जीवन के कष्टों को दूर कर सुख-समृद्धि लाती है।
दान और सेवा से मिलता है पुण्य
इस महीने में अन्न दान, वस्त्र दान, दीपदान और जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अधिकमास में किया गया दान कई गुना फल देता है।
सात्विक जीवन और व्रत का महत्व
जो लोग पुरुषोत्तम मास में व्रत रखते हैं, उन्हें सात्विक जीवन अपनाने की सलाह दी जाती है। इस दौरान प्याज, लहसुन, मांसाहार और अनाज का त्याग कर फलाहार व सरल भोजन करना श्रेष्ठ माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान, पूजा और ध्यान करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है।
क्या नहीं करना चाहिए?
अधिकमास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। नया घर, वाहन या महंगी वस्तुओं की खरीदारी से भी बचने की सलाह दी जाती है।
पुरुषोत्तम मास की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पहले अधिकमास को “मलमास” कहा जाता था और इसे अशुभ माना जाता था। उपेक्षित महसूस कर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुंचा। तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” देकर सबसे पवित्र महीनों में स्थान दिया। तभी से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।
धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे महीने में जो भक्त निस्वार्थ भाव से पूजा-पाठ, दान और अच्छे कर्म करता है, उसे भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं।



