पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक )
रायपुर/छत्तीसगढ़. 13 जुलाई से छत्तीसगढ़ विधानसभा का पावन मानसून सत्र आहूत किया गया है। क्या यह सत्र काफी हंगामेदार होगा ? संभावनाएं तो यही व्यक्त की जा रही है सिर्फ राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में ही नहीं बल्कि व्यवसायिक और प्रदेश के हर चौक-चौराहों तक। दरअसल ये संभावनाएं वाजिब भी है। “साय सरकार” का आधा कार्यकाल समाप्त हो चुका है, और भाजपा में कुछ भी निश्चित या अनिश्चित नहीं होता है क्योंकि……!
यहां कभी भी मुख्यमंत्री को छोड़ कर पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया जाता है और कभी-कभी तो मुख्यमंत्री ही बदल दिया जाता है। कैडर बेस पार्टी में निर्णय हाईकमान करता है जो कभी दिखाई देता है और कभी-कभी पूर्णतः अदृश्य होता है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री निवास में हुई अचानक हाईलेवल बैठक ने कई कयास छोड़ दिए गए और दर्जनों प्रश्न धरातल और हवा में तैर रहे हैं कि ऊपर वाला जाने आगे क्या होगा ? वैसे यहां ऊपर वाला का सीधा संबंध दिल्ली और नागपुर से है……..
खैर बात प्रदेश की – छत्तीसगढ़ जो कभी “धान का कटोरा” कहलाता था अब “घोटालों का कटोरा” बन कर रह गया है…….? विभिन्न कारणों से पिछले कुछ दिनों से पूरे प्रदेश में वर्तमान सरकार के लिए एक नकारात्मक दृष्टिकोण बनते जा रहा है कारण दर्जनों है। आधा समय बीत चुका है और वैसे कांग्रेस चुनावी मोड़ में आ चुकीं हैं राहुल गांधी का एक दिवसीय दौर साथ ही भाजपा की तर्ज में शहर एवं जिला अध्यक्षों का आवासीय प्रशिक्षण शिविर सिर्फ एक बानगी है।
महिला एवं बाल विकास विभाग में “साडी” अब भौतिक रूप में नहीं वरन राशि के रूप में दी जायेगी। आदिवासी विकास विभाग में उजागर दर्जनों निर्माण और खरीदीं के मामले हो या फिर ट्रांसफर-पोस्टिग में पैसों का खेल हो या खनन विभाग में रेत के कारोबार और माफियाओं का कब्जा। किन-किन मामलों को लिखें ?
राजधानी रायपुर में एक मंत्री के ऊपर सीधा आरोप है कि वो अपनी विधानसभा सहित जुड़े जिलों सहित आस-पास के विधानसभा क्षेत्रों में रेत के पूरे कारोबार में एकछत्र कब्जा जमा कर बैठे हैं और उनके बगैर दर्जनों रेत खदानों से एक मुठ्ठी रेत तक नहीं निकल सकती है। बैकुण्ठपुर में रेत के काले कारोबार ने गैंगवार को जन्म दिया और पूरा मामला खौफनाक अंजाम तक पहुँच गया, लेकिन सरकार को घटना के बाद भनक लगी, कारण भाजपा के तथाकथित दो दिग्गजों की आपसी लड़ाई और इंटेलिजेंस फेलियर अंजाम ट्रिपल हत्याकांड में सरकार की भद्द पिट गई। अंततः सीबीआई जाँच का ऐलान कर दिया गया। अब सीबीआई तह तक पहुँचकर खुलासा करेगी कि असली सच क्या है? वैसे रेत के इस काले कारोबार के पीछे दिग्गजों के हाथ के साथ-साथ मुंह भी काले हो गए हैं।
तो वहीं यह मामला ठंडा भी नहीं हुआ था की राजधानी के नकटी गाँव ने सरकार की नाक काट दी। वैसे बात नकटी गांव और सिर्फ 85 परिवारों के इस मामले में कार्यवाही से मैं निजी तौर पर बिल्कुल सहमत हूं, पर समय और तरीका गलत था। सरकार की कार्ययोजना वर्षों पूर्व तय की जाती है। मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि निर्णय सामूहिक होते हैं जो राज्य की सबसे बड़ी पंचायत “विधानसभा” में तय होते हैं, आगामी मानसून सत्र में भी कुछ अति महत्वपूर्ण फैसले लिए जायेंगे। क्या सरकार को हर मोर्चे में झुक जाना चाहिए, वो भी सिर्फ ‘विरोध’ के लिए, जब सरकार अपनी, कार्ययोजना के लिए निजी भूमि अधिग्रहण कर लेती तो शासकीय भूमि पर निर्णय का विरोध क्यो ? यदि यह जमीन सम्मिलित चारागाह है तो शासन-प्रशासन को अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने दिया था क्या ? यह सिर्फ चर्चा ही नहीं जांच का भी विषय है।
निश्चित ही साय सरकार इन जैसे दर्जनों मामलों में विधानसभा में बुरी तरह घिरने जा रही है। कांग्रेस को ऐसे तमाम मामलों का राजनीतिक लाभ होगा और वो तो फ़ायदा लेने को तैयार बैठी भी है। वहीं तकरीबन 1300 सवालों की बौछार सरकार को झेलना होगा। देखने वाली बात यह है कि क्या अजय चंद्राकर जैसे तेजतर्रार विधायक और पूर्व मंत्री इस बार अपना पैनापन दिखाते हैं या नहीं या फिर भाई तक पहुंची ईडी की तपिश उनकी धार को कुंद कर देगी। फिलहाल तो कहीं ना कहीं ये तमाम मामले सरकार के लिये बड़े नुकसानदायक दिखाई दे रहे हैं।
यक्ष प्रश्न :
1.- क्या नकटी के साथ सांसद बृजमोहन अग्रवाल की 40 साल की राजनीति में भी बुलडोजर चला दिया गया है या बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया गया है ?
2.- क्या छत्तीसगढ़ के राजनैतिक परिदृश्य और खासकर भाजपा में यूथ आइकॉन माने जाने वाले मंत्री ओ.पी. चौधरी की विश्वसनीयता पर भी संकट खड़ा हो गया है ?
3.- सहकारिता विभाग द्वारा सहकारिता सप्ताह मना लेने से सहकारिता की आत्मा में हुए छेद बंद हो जायेंगे या अपेक्स सहित जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों में हो रहे गबन-घोटालो-फर्जीवाडो पर रोक लग जायेगी ?



