Jagannath Temple में होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। इस साल 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे। हर वर्ष निकलने वाली यह यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा पर्व मानी जाती है।
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रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ से जुड़ी एक ऐसी परंपरा है, जो हर साल लोगों के बीच चर्चा का विषय बन जाती है। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर विशेष महास्नान के बाद भगवान 14 दिनों तक बीमार पड़ जाते हैं। इस दौरान मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और भक्तों को दर्शन नहीं होते। इस परंपरा को “अनासरा विधान” कहा जाता है।
108 कलशों से स्नान, फिर हो जाता है ज्वर
मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को 108 कलशों में भरे सुगंधित शीतल जल से स्नान कराया जाता है। स्नान के बाद भगवान “गजाबेशा” धारण करते हैं, लेकिन अगले ही दिन उन्हें तेज ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे 14 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं।
सवाल उठता है… जब बीमार पड़ते हैं तो हर साल स्नान क्यों?
अक्सर लोग सवाल करते हैं कि जब हर साल स्नान के बाद भगवान बीमार पड़ते हैं तो फिर यह परंपरा निभाई ही क्यों जाती है। धार्मिक मान्यता कहती है कि भगवान अपने भक्तों के दुख, रोग और पीड़ा स्वयं अपने ऊपर ले लेते हैं, इसलिए उन्हें बीमारी होती है।
कोरोना के क्वारंटाइन से जुड़ा है इसका विज्ञान
बीमारी के दौरान रोगी को कुछ दिन अलग रखना आज की भाषा में क्वारंटाइन कहा जाता है। दुनिया ने कोरोना महामारी के दौरान 14 दिन अलग रहने का नियम अपनाया था, लेकिन भारतीय परंपरा में यह व्यवस्था सदियों पहले से मौजूद रही है।
जन्म के बाद मां और नवजात को अलग रखना, मृत्यु के बाद सूतक-पातक के नियम, संक्रामक रोगियों को अलग रखना — ये सभी उसी प्राचीन व्यवस्था का हिस्सा माने जाते हैं।
भक्त माधवदास की कथा से जुड़ी है परंपरा
कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधवदास एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं था। अपने भक्त को कष्ट में देखकर भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आए और उनकी सेवा करने लगे।
भगवान ने दवा दी, भोजन कराया और देखभाल की। जब माधवदास ठीक हुए तो उन्होंने भगवान से पूछा कि आप मुझे सीधे स्वस्थ भी कर सकते थे, फिर यह सब क्यों किया?
तब भगवान ने कहा कि कर्मों का फल हर व्यक्ति को भोगना पड़ता है, लेकिन तुम्हारी बीमारी के बाकी बचे 15 दिन मैं अपने ऊपर ले लेता हूं।
तभी से निभाई जा रही है यह परंपरा
मान्यता है कि उसी दिन ज्येष्ठ पूर्णिमा थी। भगवान मंदिर लौटे और उन्हें भी ज्वर हो गया। तभी से हर साल स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ते हैं और 14 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं।
जब भगवान स्वस्थ होते हैं तो विशेष अनुष्ठान के बाद फिर भक्तों को दर्शन देते हैं और इसके बाद निकलती है विश्व प्रसिद्ध Ratha Yatra Puri।
यही वजह है कि करोड़ों श्रद्धालु मानते हैं कि महाप्रभु हर वर्ष अपने भक्तों का दुख अपने ऊपर लेकर उन्हें कष्टों से मुक्त करते हैं।



