हिन्दू धर्म में काल भैरव जयंती का विशेष महत्व है। यह पर्व भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव को समर्पित है, जिन्हें समय, न्याय, मृत्यु और दुष्ट शक्तियों का नियंत्रक माना जाता है। इसे भैरव अष्टमी या कालाष्टमी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन काल भैरव की पूजा करने से भय, नकारात्मक ऊर्जा, ग्रह दोष, शत्रु बाधा, रोग और अकाल मृत्यु का संकट टलता है।
यह भी पढ़े :- Delhi Car Blast Updates : दिल्ली ब्लास्ट में 13 की मौत, i-20 कार में हुआ था धमाका
इस वर्ष काल भैरव जयंती 12 नवंबर 2025, बुधवार को मनाई जाएगी।
भगवान काल भैरव कौन हैं?
पुराणों के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने अहंकारवश भगवान शिव का अपमान किया, तब शिव के क्रोध से काल भैरव प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्मा के पांचवे सिर को काटा और तभी से उन्हें “संहारक” और “न्याय के देवता” के रूप में पूजनीय माना गया। उनकी सवारी काला कुत्ता है, जो वफादारी और सतर्कता का प्रतीक है।
पंचांग अनुसार शुभ मुहूर्त:
कार्तिक कृष्ण अष्टमी तिथि 11 नवंबर रात 11:08 बजे से शुरू होकर 12 नवंबर रात 10:58 बजे समाप्त होगी। इस दिन की पूजा सुबह 6:41 से 9:23 बजे और 10:44 से दोपहर 12:05 बजे तक श्रेष्ठ समय में की जा सकती है।
पूजा विधि:
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। काल भैरव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। सरसों के तेल का दीपक जलाएं। मंत्र जाप करें – “ॐ काल भैरवाय नमः” या “ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरुकुरु बटुकाय ह्रीं” (108 बार)। इसके बाद काल भैरव अष्टक या स्तोत्र पाठ करें और विशेष भोग चढ़ाकर आरती करें।
विशेष भोग:
- इमरती – सुख और समृद्धि के लिए
- दही-बड़े – उग्र ऊर्जा शांत करने हेतु
- उड़द दाल की खिचड़ी – मनोकामना पूर्ति के लिए
- काले तिल की मिठाई – शनि दोष निवारण
- मदिरा – आध्यात्मिक समर्पण और निर्भयता का प्रतीक (मंदिर परंपरा अनुसार)
महत्व:
काशी के कोतवाल कहे जाने वाले काल भैरव की पूजा से जीवन में सुरक्षा, स्थिरता और पाप मुक्ति मिलती है। राहु-केतु और शनि दोष से छुटकारा मिलता है। इस दिन उपवास, जागरण और भैरव मंदिर दर्शन विशेष फलदायी होते हैं। काल भैरव की कृपा से जीवन में अंधकार दूर होता है और सफलता मिलती है।



