रायपुर। राजधानी रायपुर के प्राचीन श्री विरंचीनारायण मंदिर एवं नरसिंहनाथ मंदिर सार्वजनिक न्यास की बेशकीमती जमीन की कथित अवैध खरीदी-बिक्री के मामले में न्यायालय पंजीयक, सार्वजनिक न्यास ने बड़ा आदेश जारी किया है। 29 सितंबर 2026 को पारित आदेश में संबंधित तहसीलदार को राजस्व अभिलेखों में आवश्यक सुधार करने तथा संबंधित थाना को प्रावधानों के अनुसार दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

मामला रायपुर के धरमपुरा स्थित खसरा नंबर 293/7, रकबा 0.158 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। शिकायतकर्ता पत्रकार पंकज विश्वकर्मा और मामले में पैरवी करने वाले अधिवक्ता महंत राम आशीष दास के अनुसार, यह भूमि सार्वजनिक न्यास की संपत्ति है और इसके विक्रय के लिए सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी।

CM के जनदर्शन में पहुंची थी शिकायत
जानकारी के मुताबिक, पत्रकार पंकज विश्वकर्मा ने 8 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के जनदर्शन कार्यक्रम में इस जमीन की कथित अवैध खरीदी-बिक्री को लेकर दस्तावेजों के साथ शिकायत की थी। इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कलेक्टर रायपुर को मामले की जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए गए।

कलेक्टर गौरव सिंह के निर्देश पर दस्तावेजों की जांच के बाद मामला पंजीयक, सार्वजनिक न्यास एवं अनुविभागीय अधिकारी राजस्व के समक्ष पहुंचा और विधिवत कार्यवाही शुरू हुई।
21 लाख के प्रस्ताव से लेकर दूसरे नाम पर रजिस्ट्री तक सवाल
शिकायत और न्यायालय के समक्ष रखे गए दस्तावेजों के अनुसार, आरोप है कि स्वयंभू ट्रस्टी अजय तिवारी, महंत देवदास वैष्णव तथा अन्य संबंधित लोगों की भूमिका के बीच ट्रस्ट की जमीन के विक्रय की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

प्रकरण में यह भी आरोप सामने आया कि ट्रस्ट की बैठक में विजय जैन के बेटों सौरभ जैन और निखिल जैन के नाम पर जमीन खरीदने का प्रस्ताव करीब 21 लाख रुपये में रखा गया था, लेकिन बाद में उक्त भूमि का विक्रय विलेख घनश्याम दानी के नाम पर पंजीकृत हुआ।

शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि वर्ष 2022 में जमीन का बाजार मूल्य करीब 2.50 करोड़ रुपये से अधिक था। दस्तावेजों में अन्य संभावित खरीदारों के नाम और अलग-अलग रकम के प्रस्ताव दर्ज होने का भी उल्लेख किया गया है। इसी बिंदु को लेकर पूरी बिक्री प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए।
न्यायालय ने धारा 14 के प्रावधान को माना अहम
आदेश में छत्तीसगढ़ लोक न्यास अधिनियम, 1951 की धारा 14 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सार्वजनिक न्यास की अचल संपत्ति के विक्रय, बंधक, विनिमय या दान के लिए पंजीयक की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।

न्यायालय ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व आदेश का भी उल्लेख किया है, जिसमें सार्वजनिक न्यास की संपत्ति के हस्तांतरण के लिए पंजीयक की पूर्व अनुमति की आवश्यकता को स्पष्ट किया गया था।
राजस्व रिकॉर्ड में भी सामने आई गड़बड़ी
प्रकरण में राजस्व अभिलेखों को लेकर भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। आदेश के मुताबिक, भूमि के रिकॉर्ड में प्रबंधक कलेक्टर रायपुर का नाम दर्ज किए जाने से संबंधित प्रक्रिया हुई थी, लेकिन बाद के राजस्व अभिलेखों में यह प्रविष्टि सही रूप से दर्ज नहीं हो सकी।
न्यायालय ने इस स्थिति को देखते हुए राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
बिना अनुमति बिक्री को न्यायालय ने बताया विधि विरुद्ध
आदेश में कहा गया है कि प्रश्नाधीन भूमि सार्वजनिक न्यास की संपत्ति है और इसके हस्तांतरण के लिए पंजीयक सार्वजनिक न्यास की पूर्व अनुमति आवश्यक थी। न्यायालय के अनुसार, ऐसी अनुमति के बिना भूमि का विक्रय किया जाना नियम विरुद्ध एवं अवैध है तथा इससे लोक न्यास के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना परिलक्षित होता है।
इसी आधार पर तहसीलदार को राजस्व अभिलेखों में सुधार और संबंधित थाना को प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए हैं।
आदेश के बाद बढ़ी कार्रवाई की उम्मीद
इस फैसले के बाद अब मामले में पुलिस और राजस्व स्तर पर आगे की कार्रवाई को लेकर नजरें टिकी हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि यह मामला केवल एक जमीन की बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक न्यास की संपत्तियों की सुरक्षा और उनके कथित दुरुपयोग से जुड़ा व्यापक विषय है।
हालांकि, जिन व्यक्तियों पर शिकायत में आरोप लगाए गए हैं, उनके खिलाफ आपराधिक दोष सिद्ध होना अलग कानूनी प्रक्रिया का विषय है। फिलहाल न्यायालय सार्वजनिक न्यास के आदेश के आधार पर राजस्व सुधार और संबंधित थाना स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़नी है।




