पितृ पक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इस दौरान खान-पान को लेकर भी कई तरह की धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे आम सवाल यह है कि जिस दिन घर में किसी पूर्वज का श्राद्ध हो, क्या उस दिन परिवार के सदस्य घर में बना भोजन खा सकते हैं? इसी सवाल पर प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने सवाल किया था। उनके जवाब का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है।
पहले ब्राह्मण भोज, फिर परिवार ग्रहण करे प्रसाद
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जिस दिन घर में किसी पूर्वज का श्राद्ध हो, उस दिन श्राद्ध कर्म की विधि पूरी करने के बाद सबसे पहले ब्राह्मण को भोजन कराने की परंपरा है। उन्होंने ब्राह्मण का सम्मानपूर्वक स्वागत करने, पैर धोने, आरती करने और आसन पर बैठाकर भोजन कराने की बात कही।
उनके अनुसार परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक या अधिक ब्राह्मणों को भोजन करा सकता है। भोजन कराने के बाद दक्षिणा देने की परंपरा भी बताई गई है। इसके पश्चात परिवार के सदस्य श्राद्ध के भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं।
क्या श्राद्ध के दिन घर के लोग भोजन नहीं कर सकते?
इस परंपरा के अनुसार श्राद्ध के दिन परिवार के सदस्यों के लिए भोजन करना वर्जित नहीं माना जाता, बल्कि भोजन ग्रहण करने का क्रम महत्वपूर्ण माना जाता है। श्राद्ध के लिए तैयार भोजन को निर्धारित विधि से अर्पित करने और ब्राह्मण भोज कराने के बाद परिवार के सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं।
हालांकि, श्राद्ध कर्म की विधि अलग-अलग परिवारों, क्षेत्रों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए अपने परिवार में चली आ रही परंपरा और स्थानीय धार्मिक रीति का पालन करना उचित माना जाता है।
श्राद्ध में सात्विक भोजन का महत्व
श्राद्ध कर्म में सामान्य तौर पर सात्विक भोजन तैयार करने की परंपरा है। कई परिवारों में इस दौरान प्याज-लहसुन सहित कुछ अन्य खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। भोजन में दाल, चावल, मौसमी सब्जियां, पूरी, खीर और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।
हालांकि, श्राद्ध के भोजन में क्या बनाया जाए और किन चीजों का सेवन किया जाए, इसके नियम अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं।
श्राद्ध में ब्राह्मण भोज क्यों कराया जाता है?
हिंदू धार्मिक परंपरा में श्राद्ध कर्म के दौरान ब्राह्मण भोज को महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और विधि-विधान के साथ कराया गया भोजन पितरों को समर्पित माना जाता है। इसी कारण कई स्थानों पर श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराने की परंपरा है।
प्रेमानंद महाराज ने भी अपने जवाब में श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को सम्मानपूर्वक भोजन कराने और इसके बाद परिवार के सदस्यों द्वारा प्रसाद ग्रहण करने की बात कही है।
श्राद्ध में सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा
‘श्राद्ध’ शब्द का संबंध ही श्रद्धा से माना जाता है। इसलिए इस कर्म का उद्देश्य केवल भोजन और कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करना भी है।
धार्मिक परंपराएं अलग-अलग संप्रदायों, क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं। ऐसे में किसी एक परंपरा को सभी परिवारों के लिए अनिवार्य नियम मानने के बजाय अपनी पारिवारिक परंपरा और धार्मिक रीति के अनुसार श्राद्ध कर्म करना उचित माना जाता है।




