रायपुर. छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए नवनियुक्त प्रभारी और सांसद सुखदेव भगत ने आज पत्रकार वार्ता में राज्य सरकार और राष्ट्रीय चुनाव आयोग पर एक साथ निशाना साधते हुए कहा कि “सरकार से हमारा सवाल है – जब छत्तीसगढ़िया इतना बढ़िया है तो सरकार का काम, नीति और नीयत इतना औसत क्यों है ?” वहीं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री का एक सरकारी विभाग बना दिया है। केंद्र सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।
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छत्तीसगढ़ प्रभारी एवं सासंद सुखदेव भगत ने पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि हसदेव और खनन पर जनता की अनदेखी हसदेव अरण्य समेत कई इलाकों में जंगल काटकर खदानें दी जा रही हैं। ग्राम सभा की सहमति को नज़रअंदाज़ किया गया, और आदिवासी विरोध करें तो उन पर बल प्रयोग होता है। सवाल यह है कि किसके फायदे के लिए छत्तीसगढ़ का जंगल बेचा जा रहा है?
खनिज राजस्व का लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं
डीएमएफ (जिला खनिज निधि) का पैसा प्रभावित, गांवों की जगह दूसरे कामों में लगाया जा रहा है। खनन वाले जिलों में आज भी पानी, सड़क, और अस्पताल की कमी है। छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार का विकास मॉडल आदिवासी के लिए जंगल छीन रहा है, खनिज छीन रहा है और युवा से रोजगार छीन रहा है- फिर सरकार किस विकास की बात कर रही है?“ आदिवासी के जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की बात संविधान करता है, लेकिन भाजपा सरकार में कॉरपोरेट हित हावी क्यों हैं? ”खनिज छत्तीसगढ़ का, जंगल छत्तीसगढ़ का, जमीन छत्तीसगढ़ की तो मुनाफे में छत्तीसगढ़ के आदिवासी की हिस्सेदारी कहाँ है?“ छत्तीसगढ़ सिर्फ देश का mineral warehouse नहीं है; यहाँ आदिवासी रहते हैं, उनकी संस्कति और आजीविका रहती है। जंगल कटेंगे तो सिर्फ पेड़ नहीं कटेंगे-आदिवासी की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और भविष्य कटेगा।
हसदेव अरण्य के जंगल और कोयला खदाने
जिन खदानों का आवंटन 15 साल के लिए हुआ था, उनका भंडार सिर्फ 9 साल में खत्म कर दिया गया – अंधाधुंध दोहन। हसदेव में लगभग 170 प्रकार के औषधीय पौधे और वृक्ष – पर्यावरण को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। ”यह विवेकहीन सरकार है या संवेदनहीन?“ ”भाजपा सरकार आंकड़ों से जनता को गुमराह कर रही है, हम आंकड़ों से ही उनका झूठ बेनकाब करेंगे।“ ”कांग्रेस जनता के हक की लड़ाई विधानसभा से लेकर हर जिले तक लड़ेगी“ – यह हमारा संकल्प है।
आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन पर हमला
पेसा कानून और वन अधिकार कानून का पालन कमज़ोर है। वन अधिकार पट्टों के लंबित या खारिज आवेदनों का हिसाब मांगें।
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