रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश स्टारर फिल्म ‘रामायण: पार्ट 1’ को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह है। नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही इस फिल्म के टीजर-ट्रेलर के साथ ए.आर. रहमान और डॉ. कुमार विश्वास के निर्देशन में तैयार गीत ‘जय जय राम’ भी चर्चा में है।
‘जय जय राम’ में भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह से लेकर भाइयों के बीच स्नेह और पारिवारिक रिश्तों की झलक दिखाई गई है। इसी गीत में राम के भाइयों भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ सीता की बहनों उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति के किरदारों की झलक भी देखने को मिली। फिल्म में शत्रुघ्न की भूमिका अभिनेता नितेश शर्मा निभा रहे हैं।
रामायण की कथा में भगवान राम, लक्ष्मण और भरत के त्याग और समर्पण की चर्चा अधिक होती है, लेकिन सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने कई मौकों पर पर्दे के पीछे रहकर अयोध्या और रघुकुल की जिम्मेदारियां संभालीं।
कौन थे शत्रुघ्न?
शत्रुघ्न राजा दशरथ और महारानी सुमित्रा के पुत्र तथा लक्ष्मण के जुड़वां भाई थे। रामायण परंपरा में उन्हें चारों भाइयों में सबसे छोटे के रूप में वर्णित किया गया है। उनका विवाह मिथिला नरेश जनक के अनुज कुशध्वज की पुत्री श्रुतकीर्ति से हुआ था।
धार्मिक परंपराओं में शत्रुघ्न को भगवान विष्णु के अस्त्र सुदर्शन चक्र से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, यह मान्यता विभिन्न रामायण परंपराओं और धार्मिक कथाओं में अलग-अलग रूपों में मिलती है।
राम के वनवास के दौरान शत्रुघ्न ने संभाली जिम्मेदारी
भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के दौरान लक्ष्मण उनके साथ वन चले गए, जबकि भरत ने अयोध्या का राजसिंहासन स्वीकार नहीं किया। भरत नंदीग्राम में तपस्वी जीवन बिताते हुए श्रीराम की पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर राज्य संचालन की जिम्मेदारी निभाते रहे।
ऐसे समय में शत्रुघ्न अयोध्या की प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उन्होंने राजपरिवार और अयोध्या की व्यवस्था को संभालने में भरत का सहयोग किया। तीनों राजमाताओं—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—की सेवा और देखभाल में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
इस तरह शत्रुघ्न का त्याग ऐसा था, जिसमें उन्होंने सत्ता या प्रसिद्धि की अपेक्षा किए बिना परिवार और राज्य के दायित्वों को निभाया।
लवणासुर का वध कर बसाई मथुरा
शत्रुघ्न को केवल प्रशासक ही नहीं, बल्कि एक पराक्रमी योद्धा के रूप में भी जाना जाता है। रामायण की उत्तरकथा के अनुसार, मधुवन क्षेत्र में लवणासुर नामक राक्षस का आतंक था। ऋषि-मुनियों और आसपास के लोगों को उससे मुक्ति दिलाने के लिए भगवान राम ने शत्रुघ्न को लवणासुर का वध करने का आदेश दिया।
कथा के अनुसार लवणासुर के पास भगवान शिव से प्राप्त एक शक्तिशाली त्रिशूल था। शत्रुघ्न ने रणनीति के साथ उसका सामना किया और उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने उस क्षेत्र में एक नगर बसाया, जिसे आगे चलकर मथुरा के रूप में प्रसिद्धि मिली।
लव-कुश से भी हुआ शत्रुघ्न का सामना
लवणासुर के वध के लिए जाते समय शत्रुघ्न के महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रुकने का भी वर्णन मिलता है। इसी दौरान माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया था।
बाद में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के दौरान यज्ञ का घोड़ा लव-कुश द्वारा रोक लिया गया। इसके बाद अयोध्या की सेना और लव-कुश के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें शत्रुघ्न का भी सामना दोनों भाइयों से हुआ।
अश्वमेध यज्ञ में भी निभाई अहम जिम्मेदारी
रामायण की उत्तरकथा में शत्रुघ्न को श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ से जुड़े अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए बताया गया है। यज्ञ के घोड़े की सुरक्षा और उसके मार्ग में आने वाली चुनौतियों का सामना करने में उन्होंने योगदान दिया।
इससे स्पष्ट होता है कि शत्रुघ्न की भूमिका केवल अयोध्या तक सीमित नहीं थी। वे प्रशासन, राजपरिवार की सेवा और युद्ध—तीनों क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे।
अंत में भाइयों के साथ सरयू में प्रवेश
श्रीराम के अवतार काल की समाप्ति के समय शत्रुघ्न ने भी अपने भाइयों के साथ अयोध्या से विदा ली। धार्मिक परंपरा के अनुसार, उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य की जिम्मेदारी सौंपने के बाद भगवान राम, लक्ष्मण और भरत के साथ सरयू नदी में प्रवेश किया और बैकुंठ धाम को प्रस्थान किया।
रामायण की विशाल कथा में शत्रुघ्न का चरित्र अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है, लेकिन उनका जीवन कर्तव्य, त्याग, परिवार के प्रति निष्ठा और पराक्रम का उदाहरण माना जाता है। उन्होंने बिना किसी राजसिंहासन की लालसा के रघुकुल की जिम्मेदारियों को निभाया और जरूरत पड़ने पर योद्धा के रूप में भी अपनी क्षमता साबित की।




