बलौदाबाजार, 11 जून। Balodabazar Violence : बलौदाबाजार हिंसा को दो साल बीत चुके हैं। सरकारी भवनों की टूटी दीवारें फिर खड़ी हो गईं, जले हुए दफ्तर फिर आबाद हो गए और प्रशासनिक व्यवस्था भी पटरी पर लौट आई। लेकिन उस आग में अपनी गाड़ियां गंवाने वाले कर्मचारी और आम नागरिक आज भी उसी सवाल के साथ खड़े हैं, आखिर उनकी मेहनत की कमाई का हिसाब कौन देगा? दो साल बाद भी उनके जख्म और इंतजार दोनों बाकी हैं।

10 जून 2024 को बलौदाबाजार में हुई आगजनी और हिंसा की घटना को दो वर्ष पूरे हो गए हैं। इस घटना ने जिले की प्रशासनिक व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और आम जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया था। दो साल बाद सरकारी भवनों की मरम्मत हो चुकी है, कार्यालय फिर से व्यवस्थित हो गए हैं और न्यायिक प्रक्रिया भी जारी है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक ऐसा पक्ष है, जिसकी पीड़ा आज भी जस की तस बनी हुई है, वे कर्मचारी और आम नागरिक, जिनके निजी वाहन उस दिन आग की भेंट चढ़ गए थे।
आग में जल गई थी वर्षों की मेहनत
हिंसा और आगजनी के दौरान संयुक्त जिला कार्यालय परिसर में खड़े सैकड़ों दोपहिया और चारपहिया वाहन जलकर राख हो गए थे। इनमें पुलिस विभाग के जवानों और अधिकारियों से लेकर विभिन्न विभागों के कर्मचारी, लिपिक, सहायक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक शामिल थे। कई कर्मचारियों के लिए ये वाहन केवल साधन नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और शासकीय दायित्वों को निभाने का आधार थे। कुछ ने इन्हें खरीदने के लिए ऋण लिया था, जिसकी किस्तें वाहन जलने के बाद भी चुकानी पड़ीं।

दो साल बाद भी नहीं मिला पूरा मुआवजा
घटना के बाद जले हुए वाहनों का पंचनामा तैयार किया गया, नुकसान का आकलन हुआ और रिपोर्ट शासन को भेजी गई। लेकिन प्रभावित कर्मचारियों का कहना है कि दो वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें उनकी निजी क्षति के एवज में कोई ठोस आर्थिक सहायता नहीं मिली। कुछ लोगों को बीमा कंपनियों से आंशिक राशि मिली, लेकिन वह वास्तविक नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं थी। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें बीमा का लाभ नहीं मिल पाया।
अधर में निजी नुकसान
इस हिंसा में शासन को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ था। संयुक्त जिला कार्यालय और अन्य सरकारी परिसरों में आगजनी व तोड़फोड़ के बाद व्यापक मरम्मत और पुनर्निर्माण कार्य किए गए। आज अधिकांश भवन पहले की तरह संचालित हो रहे हैं और घटना के निशान लगभग मिट चुके हैं। लेकिन उन कर्मचारियों की व्यक्तिगत क्षति आज भी अनदेखी बनी हुई है, जिनकी गाड़ियां शासकीय दायित्वों के दौरान कार्यालय परिसर में खड़ी थीं और आग में जल गईं।
जले हुए ढांचे आज भी पूछ रहे सवाल
दो साल बाद भी कई स्थानों पर जले हुए वाहनों के अवशेष उस भयावह दिन की याद दिलाते हैं। ये केवल लोहे के ढांचे नहीं, बल्कि उन परिवारों की अधूरी पीड़ा और संघर्ष की कहानी हैं, जो आज भी मुआवजे और न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी
बलौदाबाजार हिंसा कांड को दो वर्ष पूरे होने पर एक सवाल फिर सामने खड़ा है, जब सार्वजनिक संपत्तियों की मरम्मत और पुनर्निर्माण संभव हो गया, तो कर्मचारियों और आम नागरिकों की निजी क्षति की भरपाई के लिए अब तक कोई ठोस पहल क्यों नहीं हुई? यह सवाल आज भी जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।



