रायपुर/छत्तीसगढ़ :राज्य में माध्यमिक शिक्षा मंडल की एक भारी गलती सामने आई है। 8वीं बोर्ड परीक्षा के अंतिम दिन दिये गये प्रश्नपत्र में उत्तर लिखने के लिए जगह ही नहीं दी गई ये शिक्षा विभाग की लापरवाही है। प्रश्नपत्रों में कई ऐसे प्रश्न शामिल किए गए थे, जिनके उत्तर लिखने के लिए पर्याप्त स्थान ही नहीं था। इस चूक ने छात्रों को असमंजस और परेशानी में डाल दिया। शिक्षकों और छात्रों सहित उनके अभिभावकों ने बताया कि प्रश्नपत्र के प्रश्न क्रमांक 17 में 10 अंकों का एक प्रश्न विकल्प के साथ दिया गया था, लेकिन दोनों ही विकल्पों के उत्तर लिखने के लिए कोई स्थान ही नहीं था।
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ऐसे में छात्रों को या तो सीमित जगह में ही उत्तर लिखना पड़ा या वे लिख भी नहीं पायें। इससे परीक्षा के दौरान तारतम्यता भी प्रभावित हुई। यह पहली बार नहीं है जब परीक्षा प्रबंधन में ऐसी खामियां सामने आई हों,पूरे परीक्षा सत्र के दौरान विभागीय स्तर पर लगातार गड़बड़ियां देखने को मिलती रहीं हैं। परीक्षा शुरू होने के साथ ही प्रश्नपत्रों में त्रुटियां और सिलेबस से बाहर के प्रश्न पूछे जाने जैसे मामले भी सामने आए थे।
लगातार कमियां और गड़बड़ियों ने व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए.
इस शैक्षणिक सत्र में आयोजित विभिन्न परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर पहले ही सवाल उठ चुके हैं। 12वीं बोर्ड परीक्षा में पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था की साख को बट्टा लगा था। इसके साथ ही 5वीं और 8वीं की परीक्षाओं में भी प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता और वितरण प्रक्रिया को लेकर गंभीर लापरवाही उजागर हुई है। राज्य में शैक्षणिक स्थिति इतनी गंभीर और चिंताजनक थी कि कक्षा 5वीं की परीक्षाओं में शिक्षकों पर नकल कराने के गंभीर आरोप भी लगे हैं। इसके अलावा विभाग द्वारा पर्याप्त प्रश्नपत्र उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण कई केंद्रों पर शिक्षकों को फोटोकॉपी कराकर पेपर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, जो परीक्षा की गोपनीयता और निष्पक्षता दोनों पर सवाल खड़े करता है।
इसके लिए जिम्मेदार कौन और जवाबदेही कब तक तय होगी.
हाल के वर्षों में शिक्षा विभाग द्वारा की जा रही लापरवाही लगातार सामने आ रही है और इन घटनाओं से साफ है कि परीक्षा प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया में समन्वय सहित निगरानी का अभाव है। शिक्षा विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि केवल परीक्षा आयोजित कर लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना भी उतनी ही आवश्यक है। अब प्रश्न उठता है कि शिक्षा विभाग इन खामियों को कब गंभीरता से लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करेंगा और भविष्य में ऐसी भारी खामियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस सुधारात्मक कदम उठाए। आखिर इसका खामियाजा तो छात्र छात्राओं को ही भुगतना पड़ता है।



