विशेष रिपोर्ट : टीम रायपुर न्यूज नेटवर्क एवं RNN24 न्यूज
छोटे डोगर/रायपुर. महाराष्ट्र के नागपुर को कंपनी मुख्यालय बना कर छत्तीसगढ़ में खनन, इस्पात और ऊर्जा क्षेत्र में कारोबार को संचालित करती जायसवाल निको फिर एक बार भारी विवादों में घिर गई है। औद्योगिक और खनन के विस्तार के बीच जयसवाल निको इंडस्ट्रीज एक बार फिर अपने पुराने कोयला ब्लॉक विवाद और पर्यावरणीय अनुपालन से जुड़े सवालों के कारण चर्चा में है।

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कंपनी की खनन क्षमता बढ़ाने और रायपुर के सिलतरा संयंत्र के विस्तार की योजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं, लेकिन दूसरी ओर कंपनी से जुड़े पुराने कानूनी मामलों का साया भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं छोटे डोगर स्थित कंपनी की लौह अयस्क खदानों पर भी विवाद छिड़ गया है। और उत्पादन और परिवहन पूरी तरह बंद करा दिया गया है।

सबसे गंभीर मामला कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़ा है। दिल्ली की विशेष CBI अदालत ने 9 दिसंबर 2024 को कंपनी के प्रबंध निदेशक रमेश जयसवाल को कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। कंपनी ने स्वयं स्टॉक एक्सचेंज को इस फैसले की जानकारी दी थी। बाद में अगस्त 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी सजा और सजा के आदेश पर अंतरिम राहत देते हुए अपील पर सुनवाई का रास्ता खोला। यानी मामला अभी अंतिम रूप से समाप्त नहीं हुआ है।

क्या खदानें बढ़ेंगी तो समग्र रूप से निगरानी भी बढ़ेगी ?
जयसवाल निको के नारायणपुर स्थित छोटेडोंगर लौह अयस्क खदान को पहले 0.05 MTPA से बढ़ाकर 2.95 MTPA क्षमता के लिए पर्यावरणीय मंजूरी मिली थी। सरकारी पर्यावरण पोर्टल पर इस परियोजना और उसकी 192.25 हेक्टेयर की माइनिंग लीज का रिकॉर्ड उपलब्ध है। 2026 में अनुपालन दस्तावेज भी अपलोड किए गए हैं, जिनमें माइनिंग क्षेत्र को 91 हेक्टेयर तक बढ़ाने से जुड़े संशोधन का उल्लेख है।

आज 13 अगस्त को उपमुख्यमंत्री (गृह) विजय शर्मा के साथ कैबिनेट मंत्री एवं स्थानीय विधायक केदार कश्यप की जारी बस्तर तिरंगा यात्रा के दूसरे दिन ही खनन प्रभावित 13 गांवों की मां दंतेश्वरी समिति ने छोटे डोगर स्थित कंपनी की लौह अयस्क की खदानों के उत्पादन और परिवहन को बंद करा दिया। जिससे परिवहन मैं शामिल 600 से ज्यादा ट्रकें रोड में खड़ी हो गई है। समिति के अध्यक्ष उसेंडी के अनुसार ओवरलोडिंग परिवहन से स्थानीय सड़कें पूरी तरह जर्जर हो चुकी है और यह सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है।

कंपनी प्रबंधन के उच्चतर प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों और समिति सदस्यों की एक विशेष बैठक आज छोटे डोगर के खेल मैदान में खुले रूप से रखी गई थी, जिससे उत्पादन और परिवहन में आये व्यवधानों को खत्म किया जा सके। पंरतु बैठक बेनतीजा रही। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस बैठक को कव्हरेज में शामिल करने हमारे समाचार संपादक पंकज विश्वकर्मा और टीम पहुंची तो कंपनी के वाईस प्रेसिडेंट और आपरेशन हेड खनन मिश्रा और एजीएम झा बैठक स्थल को छोड़ कर रवाना हो गए। टीम द्वारा प्रबंधन से बात करने के प्रयास में उन्होंने टका सा जवाब देते हुए कहा ” जो छापना है छाप दो और जो दिखाना है दिखा दो। “

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब खनन क्षेत्र और उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, तो पर्यावरणीय दबाव, धूल, पानी और वन भूमि पर निगरानी कितनी सख्त होगी?

कंपनी के सिलतरा स्थित एकीकृत इस्पात संयंत्र के विस्तार की पर्यावरणीय प्रक्रिया भी चलती रही है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक संयंत्र को 1.2 MTPA से 2.4 MTPA तक विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए पर्यावरणीय प्रक्रिया में शामिल किया गया था।

क्या सवाल सिर्फ उत्पादन का है, जवाबदेही का नहीं है ?
एक तरफ कंपनी खदानों और स्टील प्लांट की क्षमता बढ़ाकर उत्पादन मजबूत करने की तैयारी में है, वहीं दूसरी तरफ पुराने कोयला ब्लॉक विवाद ने कंपनी के अनुपालन तंत्र और कारोबारी फैसलों पर सवाल खड़े किए थे।

हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि CBI मामले में दर्ज दोषसिद्धि रमेश जयसवाल से संबंधित थी और कंपनी ने अपने खुलासे में कहा था कि जयसवाल निको इंडस्ट्रीज स्वयं उस मामले में आरोपी नहीं थी। दिल्ली हाईकोर्ट की अगस्त 2025 की कार्यवाही में भी मामला अपील के स्तर पर है।

ऐसे में खनन विस्तार के साथ असली परीक्षा यह होगी कि स्वीकृत क्षमता, पर्यावरणीय शर्तों और खनन कानूनों का अक्षरशः पालन कितना होता है। उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में अगर नियामकीय शर्तों की अनदेखी होती है, तो इसका असर सिर्फ कंपनी पर नहीं बल्कि स्थानीय पर्यावरण और आसपास रहने वाले लोगों पर भी पड़ सकता है।




