पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक )
रायपुर : छत्तीसगढ़ में दर्जनों सार्वजनिक न्यास और पब्लिक ट्रस्ट की संपत्तियों को सुनियोजित तरीके से लूटा जा रहा है। और शिकायतों को पंजीयक, सार्वजनिक न्यास जांच के नाम पर सालों लटका कर इस लूट और डकैती को प्रश्रय दे रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जैतूसाव मठ की सैकड़ों एकड़ जमीन को फर्जी तरीके से बेचना और बैंक में जमा करोड़ों रुपए बगैर जिला प्रशासन और राज्य सरकार की जानकारी के निकालना शामिल है।
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एक वर्ष पूर्व मंहत रामआशीष दास मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ सहित उपमुख्यमंत्री, अपर मुख्य सचिव, धर्मस्व एवं धार्मिक न्यास कलेक्टर, रायपुर को साक्ष्यों के साथ शिकायत करते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए तात्कालिक अवर सचिव, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग शिकायत पर कार्यवाही के लिए कलेक्टर, रायपुर को पत्र प्रेषित करते हैं और कलेक्टर, रायपुर पंजीयक सार्वजनिक न्यास एवं एसडीएम रायपुर को कार्यवाही के लिए निर्देशित करते हैं। अब शुरू होता है जांच के नाम पर लीपापोती का खेल।

मंहत रामआशीष दास के अनुसार मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों को फर्जीवाड़ों के प्रमाण के रूप में देने के बाद भी मठ की जमीनों को बेचा जा रहा है और इसके साथ ही बैंक में फिक्स डिपॉजिट के 17 करोड़ की बंदरबांट कर ली गई और पंजीयक सार्वजनिक न्यास ने कोई कठोर कार्यवाही शुरू नहीं की। उनका कहना है कि कारण स्पष्ट है कि इस मामले में वो भी शामिल है।

रायपुर न्यूज नेटवर्क और RNN 24 न्यूज चैनल की टीम ने जब दस्तावेजों को खंगाला तो मंहत रामआशीष दास के आरोप सही साबित हो गये। कुछ मूल दस्तावेजों के परीक्षण से यह पता चला कि मंत्रालय से जारी पत्र दिनांक 15 अप्रैल 2025 को कलेक्टर, रायपुर को भेजा गया था जो कि कार्यवाही के लिए लिखा गया था। इसके साथ ही 2 अप्रैल तात्कालिक अपर मुख्य सचिव ने मूल आवेदन पर भी टीप सहित प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

मुख्यमंत्री , छत्तीसगढ़ द्वारा मूल आवेदन कलेक्टर रायपुर को 14 अगस्त 2025 एवं उपमुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ द्वारा भी मूल आवेदन 14 अगस्त 2025 को भेज दिया गया था। कलेक्टर रायपुर को प्रस्तुत आवेदन सहित सभी पत्रों को एसडीएम रायपुर को कार्यवाही के लिए भेजे जाने के बावजूद पंजीयक सार्वजनिक न्यास और एसडीएम रायपुर द्वारा सिर्फ जांच के नाम पर लीपापोती की गई।

इस पूरे मामले में जब पंजीयक सार्वजनिक न्यास और एसडीएम रायपुर नंदकुमार चौबे से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मामला पुराना है देखना पड़ेगा पर मुझे जहां तक याद है इसमें जांच चल रही हैं।

कुल मिलाकर इस वर्षों की जांच में मठ की दर्जनों एकड़ जमीन बिक गई और बैंक में जमा 17 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपॉजिट की राशि की अफ़रा-तफ़री कर दी गई। अब यक्ष प्रश्न तो यही है कि क्या इस जांच का निष्कर्ष निष्पक्ष रूप से निर्णय में तब्दील होगा और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की जायेगी या कुछ बरस और जांच चलेंगी फिर फ़ाइल दफ्तर की धूल में खो जायेंगी ?



