रायपुर : बस्तर तेजी से नक्सलमुक्त होने की ओर बढ़ रहा है। घने जंगलों में फिर से परिंदों की चहचहाहट सुनाई देने लगी है और आदिवासी इलाकों में पुरानी जिंदगी की रौनक लौट रही है। हाट-बाजारों में उमड़ती भीड़ अब बदलते बस्तर की नई तस्वीर पेश कर रही है।
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इसी बदले हुए माहौल की दिल को छू लेने वाली एक मिसाल सामने आई है सुकमा जिले के अति नक्सल प्रभावित रहे कोंटा विकासखंड की ग्राम पंचायत मरईगुड़ा-1 से। यहां तीन दशक से बंद पड़ा साप्ताहिक बाजार 30 साल बाद फिर से शुरू हो गया है। नक्सल हिंसा की लंबी त्रासदी झेलते आए इस क्षेत्र में अब अमन और भरोसे की हवा बहने लगी है।
बदलाव की यह नई कहानी केंद्र और राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों की ‘सुरक्षा के साथ समाधान’ नीति और नई पीढ़ी की जागरूकता का परिणाम है। युवा सरपंच सुश्री कोरसा स्वपना की पहल पर मरईगुड़ा-1 का साप्ताहिक बाजार वर्ष 2025 से पुनः शुरू किया गया। ग्रामसभा की सहमति से प्रस्ताव तैयार कर एसडीएम से अनुमति ली गई और शनिवार को बाजार ने फिर से अपनी धड़कनें महसूस कीं।
तीस साल बाद लगे पहले साप्ताहिक बाजार में ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बनता था। मरईगुड़ा और आसपास के दर्जनों गांवों से लोग खरीदारी करने पहुंचे। कई आदिवासी ग्रामीण अपने घरेलू उत्पाद, सब्जियां, भाजी और अन्य उपज लेकर बाजार में उतरे। चेहरों पर लंबे समय बाद दिखी सुरक्षा और खुशी की चमक इस बदलाव की गवाही दे रही थी।
यह कदम न सिर्फ आर्थिक गतिविधियों को गति देगा, बल्कि दशकों से भयग्रस्त इस इलाके में नई उम्मीदों और आत्मविश्वास का संचार भी करेगा। सरपंच सुश्री कोरसा स्वपना की यह पहल बस्तर के बदलते स्वरूप की जीवंत मिसाल बन गई है।



