पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक)
रायपुर। राजनीति में जो होता है वो दिखता नहीं और जो दिखता है वो होता नहीं, खासकर जब मुद्दे ना हो या मुद्दे से जनता का ध्यान हटाना हो। आज एक पत्र ने राजधानी के सियासी गलियारों में हलचल मच दी थी। सियासी पंडितों ने विश्लेषण शुरू ही किया था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने मिडिया के लिए जारी उस पत्र को तत्काल हटा दिया। कांग्रेस को इसमें नफा कम और नुकसान ज्यादा दिखा और किरकिरी बढ़ती उससे पहले पैर पीछे खींच लिए गए। मामला गरमाया हुआ है, माहौल संजीदा हो गया है। पर कमान से चला तीर कभी तरकश में वापस कहां और कब आया है ?

आज कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा जिसका लब्बोलुआब यह था कि भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यपाल रमेश बैस को उपराष्ट्रपति के लिए भाजपा का प्रत्याशी घोषित किया जाए। लंबी दलीलों से छत्तीसगढ़ के राजनैतिक महत्वाकांक्षा और महत्व को बताया गया। महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि छत्तीसगढ़ के 10 सांसदों से भाजपा की केंद्र में सरकार और प्रधानमंत्री का पद फिर से नरेंद्र मोदी को मिला यह जताया गया।
खैर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद रमेश बैस को भाजपा का उपराष्ट्रपति प्रत्याशी बनाने की मांग भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्वकर्ताओं को भी हज़म नहीं हुई होगी तभी यह पत्र मिडिया से वापस लिया गया। नेताओं को भी समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है। क्योंकि संसद का सत्र चल रहा है, चालू सत्र में उपराष्ट्रपति ने जो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं उन्होंने स्वास्थ्यगत कारणों का उल्लेख कर राष्ट्रपति को त्यागपत्र भेजा और तत्काल प्रभाव से स्वीकार भी कर लिया गया। इसके प्रभाव और राजनैतिक कारणों का विश्लेषण जारी है।
हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ की राजनीति की रमेश बैस भाजपा के वयोवृद्ध नेता हैं कई बार के सांसद और कई राज्यों के राज्यपाल की भूमिका अदा कर अब शायद राजनैतिक सेवानिवृत्ति का आनंद लें रहें हो। रमेश बैस बहुत ही सज्जन और विनम्र स्वभाव के राजनेता रहे हैं। 2003 में जब जोगी सरकार थी और भाजपा को नये प्रदेश अध्यक्ष की आवश्यकता थी तब उन्होंने विनम्रता से इंकार कर डा. रमन सिंह को प्रदेश अध्यक्ष के लिए आगे किया। 90 के दशक में चुनाव प्रचार में कार्यकर्ताओं ने राजधानी की गलियों में नारा दिया ” अटल बिहारी जरूरी है, रमेश बैस मजबूरी है।” तब भी विनम्रता पूर्वक उन्होंने व्यवहार किया। तात्कालिक कांग्रेस नेताओं ने यहां तक कहा कि रमेश बैस किस्मत से चुनाव जीत जाते हैं। तब भी उन्होंने विनम्रता नहीं छोड़ी। राजनैतिक हलकों में हमेशा उनकी जीत का श्रेय बृजमोहन अग्रवाल और तरूण चटर्जी को ही दिया गया। इसे भी उन्होंने विनम्रता पूर्वक लिया।
आज काफी हाऊस की टेबलों में बात तो यह भी थी कि दीपक बैज जो कभी देवेन्द्र यादव को कार्यकारी अध्यक्ष लिख देते हैं वो क्यों रमेश बैस की पैरवी करने लगे ? छुटभैय्ए नेताओं ने दांते दिखा कर उनके नेतृत्व में ही सवाल खड़े किए पर वरिष्ठों की घुड़की ने दांत और जबान दोनों बंद करवा दिये।
यक्ष प्रश्न तो अब भी यही है कि क्या रमेश बैस का नाम आगे बढ़ा कर शतरंज की नई बिसात बिछाई जा रही है या आग में घी डालकर भड़की हुई आग से तमाशा देखने की तैयारी है ? या फिर दीपक बैज को अंधेरे में रख कर कुछ पत्रों के साथ इसमें भी दस्तखत करा लियें गये और मीडिया में चंद घंटों के लिए जारी कर दिया गया ? बवाल तो मचना ही है पर कितना ये देखने वाली बात होगी ? मतलब प्याले में तूफान है ?



