धमतरी। जिले में आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। वर्ष 2026 के शुरुआती छह महीनों में जिले में 174 लोगों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। यानी 180 दिनों की इस अवधि में लगभग हर दिन एक व्यक्ति ने अपनी जिंदगी खत्म करने जैसा कदम उठाया। पुलिस और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इन घटनाओं के पीछे घरेलू विवाद, प्रेम संबंध, आर्थिक परेशानी और मानसिक तनाव जैसे कई कारण सामने आए हैं, लेकिन नशे की बढ़ती लत एक प्रमुख साझा कारक के रूप में उभर रही है।
पुलिस आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से जून 2026 के बीच जिले के 13 थानों और दो पुलिस चौकियों के अंतर्गत आत्महत्या के 174 मामले दर्ज किए गए। इनमें अलग-अलग आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। प्रभावित परिवारों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि भी अलग-अलग रही है। इससे स्पष्ट है कि आत्महत्या की समस्या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के विभिन्न तबकों में मानसिक दबाव और संकट की स्थिति गंभीर रूप ले रही है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कई मामलों की प्रारंभिक जांच में यह सामने आया कि घटना से पहले संबंधित व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के मानसिक तनाव, पारिवारिक विवाद या रिश्तों से जुड़ी परेशानी से गुजर रहा था। कई मामलों में नशे की स्थिति ने परिस्थितियों को और गंभीर बना दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक नशा व्यक्ति की सोचने-समझने और सही निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में तनाव, गुस्सा या निराशा की स्थिति में व्यक्ति जल्दबाजी में खतरनाक फैसला ले सकता है।
सीएसपी अभिषेक चतुर्वेदी के मुताबिक, आत्महत्या के मामलों में नशे की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि समाज में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और मानसिक दबाव दोनों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। समय रहते परिवार, मित्र या आसपास के लोग किसी व्यक्ति के व्यवहार में आए बदलाव को पहचान लें तो कई मामलों में मदद पहुंचाई जा सकती है।
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट प्रीति चांडक का कहना है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों और युवाओं में भी मानसिक दबाव बढ़ रहा है। आर्थिक समस्याएं, रिश्तों में तनाव, पारिवारिक विवाद, अकेलापन और भविष्य को लेकर चिंता इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उनका कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में अब भी पर्याप्त खुलापन नहीं है। शारीरिक बीमारी होने पर लोग तुरंत डॉक्टर के पास जाते हैं, लेकिन मानसिक परेशानी को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक उदास, निराश या अकेला दिखाई दे, लोगों से दूरी बनाने लगे या लगातार नकारात्मक बातें करे, तो उसके साथ संवेदनशीलता से बातचीत करनी चाहिए। ऐसे व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय बिना जज किए उसकी बात सुनना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर की मदद लेना जरूरी है।
धमतरी में बढ़ते आंकड़े इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि आत्महत्या की रोकथाम के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ परिवार, समाज, स्कूल, स्वास्थ्य विभाग और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को मिलकर काम करना होगा। समय पर बातचीत, भावनात्मक सहयोग और पेशेवर मदद कई जिंदगियों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।



