कोंडागांव। जिला मुख्यालय में प्रस्तावित नए जिला न्यायालय भवन के लिए चिन्हित भूमि को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सर्व आदिवासी समाज और गोंडवाना समाज समन्वय समिति ने संबंधित भूमि को अपने पारंपरिक पेनस्थल (देवस्थल) और धार्मिक-सांस्कृतिक आस्था का केंद्र बताते हुए वहां चल रहे निर्माण कार्य पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। समाज के प्रतिनिधियों ने इस संबंध में एसडीएम के माध्यम से कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की है।
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समिति का कहना है कि गोंडवाना भवन के पीछे स्थित यह भूमि वर्षों से आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़ी हुई है। यहां समाज के लोग अपने पेन पुरखाओं की पूजा-अर्चना करते हैं और समय-समय पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन भी होते रहे हैं। ऐसे में इस स्थान पर न्यायालय भवन का निर्माण आदिवासी समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करेगा।
ज्ञापन में समिति ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस विषय पर समाज के प्रतिनिधियों से विस्तृत चर्चा नहीं की जाती और सभी पक्षों की सहमति नहीं बनती, तब तक निर्माण कार्य को रोक दिया जाए। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि बिना संवाद के निर्माण कार्य जारी रखा गया तो समाज व्यापक आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा।
समाज ने अपने ज्ञापन में संविधान के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संपत्ति संबंधी अधिकारों का हवाला देते हुए कई मांगें प्रशासन के सामने रखी हैं। इनमें प्रमुख रूप से निर्माण कार्य को तत्काल प्रभाव से रोकना, अंतिम निर्णय होने तक यथास्थिति बनाए रखना, भूमि से जुड़े सभी दस्तावेज, सीमांकन और स्वीकृतियों की जानकारी सार्वजनिक करना तथा समाज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है।
सर्व आदिवासी समाज के कोंडागांव जिला अध्यक्ष पनकु राम नेताम ने कहा कि यह भूमि उनके पेन पुरखाओं की है और आदिकाल से यहां पूजा-अर्चना की जाती रही है। उन्होंने कहा कि न्यायालय भवन के लिए इस जमीन का आवंटन आदिवासी समाज की आस्था के साथ जुड़ा विषय है, इसलिए समाज इसका विरोध कर रहा है।
वहीं, इस पूरे मामले पर एसडीएम अजय उरांव ने कहा कि संबंधित भूमि जिला न्यायालय भवन निर्माण के लिए आवंटित की गई है। हालांकि आदिवासी समाज ने इसे अपना पारंपरिक देवस्थल बताया है और इस संबंध में ज्ञापन सौंपा है। प्रशासन समाज की आपत्तियों और प्रस्तुत तथ्यों का परीक्षण कर नियमानुसार आगे की कार्रवाई करेगा।
फिलहाल इस मुद्दे को लेकर प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच संवाद की आवश्यकता महसूस की जा रही है। आने वाले दिनों में प्रशासन के निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि मामला विकास कार्यों के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था से भी जुड़ा हुआ है।



