सनातन धर्म में मान्यता है कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तब भगवान विष्णु विभिन्न अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं। उनके दसवें और अंतिम अवतार के रूप में भगवान कल्कि का उल्लेख किया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कलियुग के अंतिम चरण में जब पाप, अन्याय और अराजकता चरम पर पहुंच जाएगी, तब भगवान विष्णु कल्कि अवतार धारण करेंगे।
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विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि कल्कि अवतार कलियुग और सतयुग के संधिकाल में प्रकट होंगे। उनका उद्देश्य धर्म की पुनः स्थापना करना और अधर्म का अंत करना होगा। मान्यता के अनुसार, भगवान कल्कि का जन्म शंभल नामक स्थान पर होगा। उनके पिता का नाम विष्णुयशा बताया गया है, जो एक तपस्वी ब्राह्मण होंगे।
पुराणों में यह भी उल्लेख है कि भगवान कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होकर प्रकट होंगे, जिसका नाम देवदत्त बताया गया है। उनके हाथ में दिव्य तलवार होगी और उनका तेज अत्यंत प्रभावशाली माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम उनके गुरु होंगे, जो उन्हें युद्धकला और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देंगे।
कल्कि अवतार का मुख्य उद्देश्य पाप, अन्याय और दुष्ट शक्तियों का नाश करना बताया गया है। मान्यता है कि वे उन शासकों और लोगों का अंत करेंगे, जो समाज में अधर्म फैलाते हैं। इसे अच्छाई और बुराई के बीच अंतिम संघर्ष के रूप में भी देखा जाता है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार, कल्कि अवतार का सबसे बड़ा शत्रु ‘कलि’ होगा, जो कलियुग की नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक माना गया है। इस शक्ति के अंत के साथ धरती पर फिर से धर्म और सत्य की स्थापना होगी तथा सतयुग का आरंभ माना जाएगा।
हालांकि, यह सभी बातें धार्मिक मान्यताओं और पुराणों में वर्णित कथाओं पर आधारित हैं। इनके संबंध में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।



