लोकेश्वर सिन्हा
गरियाबंद : प्रधानमंत्री का सपना “हर गरीब को पक्का मकान” — लेकिन जमीनी हकीकत कहती है कि यह सपना कोपरा नगर पंचायत में अफसरों की लापरवाही, सिस्टम की खामी और डिजिटल गड़बड़ी की बलि चढ़ चुका है।
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प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी 2.0 के अंतर्गत आवेदन करने वाले 13 गरीब हितग्राही आज भी टूटती झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं, जबकि सरकारी पोर्टल के दस्तावेज़ बताने लगे हैं कि इनके नाम पर पहले ही ग्रामीण योजना के तहत आवास बन चुका है।


सबसे बड़ा सवाल
जब निर्माण ही नहीं हुआ, भुगतान ही नहीं हुआ, निरीक्षण ही नहीं हुआ — तो पोर्टल पर इनका घर कैसे ‘पूर्ण’ दिख रहा है?
क्या यह डिजिटल भारत का तकनीकी भ्रम है, फाइलों में चल रही सरकारी लूट है, या दो विभागों की लापरवाही का परिणाम?
13 गरीब परिवार सरकार, सिस्टम और सड़कों से ठुकराए
आवास से वंचित लाभार्थी हैं
होरीलाल चक्रधारी, कमल साहू, सुदर्शन लाल, महेंद्र साहू, दुष्यंत साहू, अशोक पटेल, दानीराम साहू, गोपाल साहू, प्रकाश निषाद, रामसाय निषाद, मिथलेश कुमार, जीवनलाल साहू और नीरज यादव
इन लोगों का कहना है कि उन्होंने PMAY-शहरी के लिए आवेदन किया, लेकिन जब फाइल आगे बढ़ी तो पाया गया कि PMAY-ग्रामीण पोर्टल पर वे पहले से लाभार्थी दर्ज हैं।
अब सवालउठता है ….
इनके खाते में एक भी भुगतान किस्त प्राप्त नहीं हुई
साइट निरीक्षण कभी नहीं हुआ
न कोई अधिकारी आया, न कोई निर्माण का चिन्ह
कच्ची झोपड़ी टूटी छत, बारिश में भीगते परिवार — लेकिन रिकॉर्ड में आवास ‘पूर्ण’
मामला उजागर होने के बाद नगर पंचायत कोपरा ने जनपद पंचायत फिंगेश्वर को आधिकारिक पत्र लिखकर सवाल पूछा है कि
क्या इन 13 नामों पर वाकई ग्रामीण योजना के पैसे जारी हुए और घर बना?
यदि नहीं, तो तुरंत पोर्टल से नाम हटाए जाएं
लेकिन महीनों से कोई जवाब नहीं आया, जिससे सिस्टम की कार्यशैली कटघरे में है।



