पंकज विश्वकर्मा
समाचार संपादक
रायपुर. छत्तीसगढ़ में बतौर प्रदेश प्रभारी के तौर पर भाजपा की कद्दावर और तेजतर्रार नेत्री स्मृति ईरानी का नियुक्ति के बाद प्रदेश में दो दिवसीय दौरा कल से शुरू हुआ है। प्रदेश के सियासी अखाड़े में बतौर प्रदेश प्रभारी नियुक्त होने के बाद उनका यह पहला दौरा महज एक राजनीतिक प्रवास मात्र नहीं है, बल्कि सत्ता और संगठन की नब्ज़ टटोलने से ज्यादा एक बड़ी सर्जरी की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। जो की आपरेशन थियेटर में नहीं बल्कि बंद मीटिंग रूम की टेबलों पर किया जा रहा है।

स्मृति ईरानी का यह दौरा अचानक सत्ता और संगठन में बैठे प्रदेश भाजपा के कई माननीयों और कद्दावरों के रक्त चाप और दिलों की धड़कनों में तेजी ले आया है। इस खौफ की वजह भी है और वज़ह है चंद बंद फाइलें, इन बंद फाइलों ने रायपुर – दिल्ली – रायपुर का सफर भी तय कर लिया है। वो भी मोबाइल की तरंगों और नेट की केबलों के सहारे, क्योंकि चिट्ठी-पत्री और अखबार की कतरनों का दौर अब इतिहास की बात हो चुकी है।

कल और आज अब बात हो रही है माननीयों के परफॉर्मेंस सहित भाजपा और संघ के अपने खुफिया तंत्र की इंटरनल रिपोर्ट और दिल्ली में मुख्यालय से तैनात निजी एजेंसियों की सर्वे एवं आडिट रिपोर्ट की। फिर चाहे वो सत्ता में बैठे वरिष्ठों के क्रियाकलापों और शासकीय योजनाओं के धरातल पर मूर्तरुप में साकार होने की हो या संगठन में काबिज माननीयों की ज़मीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं के भरोसे की। ये रिपोर्टें एक आईना है। प्रदेश भाजपा के सत्ता और संगठन के वरिष्ठ माननीयों को इस आइने में अपना असली चेहरा दिखाई दे या ना दे पर दिल्ली दरबार की सल्तनत को हर दाग साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है। सत्ता के गुरूर, सिक्कों की खनक और पावर के सुरुर में छिपा कर रखे चेहरों को अब खौफ सता रहा है कि जतन से छिपा कर रखे दागदार चेहरे सामने ना जाये और आ गये तो क्या होगा।

प्रदेश भाजपा के कार्यकर्ताओं की पीड़ा और टीस गाहे-बगाहे नज़र आ ही जाती है जब साधारण कामों के लिए भी वरिष्ठों के फोन या चिट्ठी काम नहीं आती उन्हें भी पोटली का चढ़ावा लगता है और तो और आमलोगों तक को इन सफेदपोश माननीयों की रेट लिस्ट पता है।

लेकिन इस बार दिल्ली दरबार के तख्त का मिजाज अलग है। सल्तनत के आलिम-फाजिल केंद्रीय एजेंसियों की खामोश पन्नों पर दिखाई दे रही लाल लकीरों से बाखूबी वाकिफ हैं। लाल लकीरें ख़ुद बा ख़ुद बोल रहीं हैं, हर माननीय की कमाई के हिसाब-किताब की लेखाबही और खोल रही है परत दर परत इनके कारनामों को। राजनैतिक हलकों में भारी शोर है कि तैयार की गई सभी रिपोर्टें रायपुर में तैयार होकर दिल्ली दरबार का चक्कर लगा कर प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी के हाथों वापस रायपुर पहुंच गई है और इन रिपोर्टों ने ही कई दिग्गजों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है।

मंत्री परिषद के सदस्य हो या संगठन के बड़े पदाधिकारी सब की बेचैनी इस बात को लेकर है कि इस बार कोई ऐसा पारंपरिक प्रभारी नहीं है जिसे बड़ी थैलियौ, बड़े सूटकेसों, वीआईपी ट्रीटमेंट, शाम की भारी और तर-बतर दावतों या चरण वंदना से मैनेज किया जा सकेगा। प्रदेश के सियासी मठाधीश इस कड़वे सच को बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं कि हर किसी की सीधी पहुंच दिल्ली में तख्तनशीं नंबर वन, नंबर टू तक नहीं है। और तो और राष्ट्रीय अध्यक्ष जो पिछले ही प्रदेश प्रभारी थे वो इन मठाधीशों के एक-एक पैंतरों और थाह को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।

इन तीनों के सामने कोई भी सियासी जुगाड़ और कोई सिफारिश काम नही आनी है। इनके सामने बड़े-बड़े रसूखदारों का कोई रसूख नहीं है, ये तो बस रसूखं का मुगालता बस है। यह तो “सूरज को दिया दिखाने जैसा है”। कल के हालात तो ये थे कि जो मंत्री कल से पहले शहंशाहों की तौर पर ठकस में झूमते थे, वे प्रदेश कार्यालय के गेट में लम्बे चौड़े काफिले को छोड़ पैदल ही सवाल-जवाब के लिए चल पड़े। और तो और प्रदेश के कानून व्यवस्था को चलाने वाली “खाकी” को भी बड़े बेआबरू कर परिसर से बेदखल कर दिया गया।

मैराथन बैठकों के दौरान मिटिंग टेबलों पर ही बगैर ब्लीडिंग के बड़ी सर्जरी की जा रही है। बैठकों के दौर की शुरुआत भी जबरजस्त हुई वह भी “मन की बात” से। इसके बाद सबसे पहले नंबर पर दौर रहा प्रदेश अध्यक्ष, संगठन महामंत्री और सभी महामंत्रीयों की समीक्षा और विषय रहा उच्च स्तरीय संगठनात्मक विचार विमर्श। इसके बाद प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की समीक्षा और बाद में सभी प्रभारियों और जिला अध्यक्षों के कामकाज की ग्राउंड रिपोर्ट। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अनुभवी और पार्टी के पुराने सिपहसालारों याने पूर्व विधायकों और सांसदों की टीस और पीड़ा को बारीकी से सुना गया। निगम मंडल और आयोगों के अध्यक्षों की हर कार्यशैली को परखा गया साथ ही आगामी लक्ष्यों को निर्धारित कर समय सीमा भी निर्धारित कर दी गई।

आज की बैठकों के दौर के बाद अब बस इस बात का इंतज़ार रहेगा कि दिल्ली दरबार की इस खामोश सर्जरी में जो की आपरेशन थियेटर में नहीं बल्कि बंद कमरों की मीटिंग टेबल पर की जा रही है शरीर के कितने अंग-भंग होते हैं ? क्योंकि लंबी बीमारी में नश्तर भी बड़ा गहरा उतारता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ओपन हार्ट सर्जरी कर “हार्ट” ट्रांसप्लांट करने की तैयारी है ?




