रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने प्रक्रिया तेज कर दी है। यूसीसी का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति अब उन राज्यों के मॉडल का अध्ययन करेगी, जहां यह व्यवस्था पहले से लागू है या इस दिशा में ठोस पहल की जा चुकी है। विशेष रूप से गोवा और उत्तराखंड के यूसीसी मॉडल का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की समितियों के अनुभवों और सुझावों का भी विश्लेषण किया जाएगा।
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राज्य सरकार की ओर से गठित समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस शत्रुघ्न सिंह, एम.के. राउत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार और सेवानिवृत्त प्राचार्य ज्योति रानी सिंह सदस्य हैं। समिति विभिन्न राज्यों के अनुभवों का अध्ययन करने के बाद छत्तीसगढ़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप यूसीसी का मसौदा तैयार करेगी।
सरकार का फोकस विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे नागरिक मामलों पर एक समान कानूनी व्यवस्था विकसित करने पर रहेगा। गोवा और उत्तराखंड में लागू प्रावधानों का विशेष अध्ययन किया जाएगा, जहां लिव-इन संबंधों से जन्मे बच्चों को भी कानूनी अधिकार दिए गए हैं तथा बहुविवाह और एकतरफा तलाक जैसी व्यवस्थाओं पर रोक के प्रावधान मौजूद हैं।
हालांकि, छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना को देखते हुए आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर भी समिति विशेष अध्ययन करेगी। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की करीब 30.62 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित है। संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची आदिवासी समाज की परंपराओं और प्रथागत कानूनों को विशेष संरक्षण प्रदान करती है। ऐसे में उत्तराखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी के दायरे से आंशिक या पूर्ण छूट देने की संभावनाओं पर विचार किया जाएगा।
समिति यह भी अध्ययन करेगी कि यदि यूसीसी लागू किया जाता है तो आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जा सकती है, ताकि संवैधानिक संरक्षण प्रभावित न हो।
सरकार का दावा है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था लागू होगी। इससे महिलाओं को समान अधिकार मिलेंगे, धार्मिक आधार पर होने वाले भेदभाव में कमी आएगी और पारिवारिक विवादों के समाधान में एकरूपता आएगी। सरकार का कहना है कि यह संविधान में निहित न्याय, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।
वहीं, इस पहल को लेकर राजनीतिक विवाद भी शुरू हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने यूसीसी को भारत जैसे विविधताओं वाले देश के लिए “पेचीदा विषय” बताते हुए कहा कि यह सभी समुदायों के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हो सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राजनीतिक लाभ और सत्ता बचाने के उद्देश्य से इस मुद्दे को आगे बढ़ा रही है।
दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि समान नागरिक संहिता का विचार संविधान निर्माताओं की भावना के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि गोवा और उत्तराखंड के बाद अब छत्तीसगढ़ भी इस दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है और व्यापक अध्ययन तथा सभी पक्षों से चर्चा के बाद आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।



