रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग एक बार फिर विवादों में आ गया है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक की कार्यशैली को लेकर उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों ने नाराजगी जताई है। सदस्यों ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को ज्ञापन सौंपते हुए कार्रवाई की मांग की है।
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आयोग की सदस्य लक्ष्मी वर्मा समेत अन्य सदस्यों ने अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जनसुनवाई का बहिष्कार किया। सदस्यों का आरोप है कि आयोग में कार्यप्रणाली के नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है और अध्यक्ष की कार्यशैली से आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
अध्यक्ष पर मनमानी और नियम तोड़ने का आरोप
सदस्यों द्वारा दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि आयोग के अधिनियम के तहत अध्यक्ष और सदस्यों की संयुक्त द्विसदस्यीय पीठ मामलों की जनसुनवाई करती है, लेकिन डॉ. नायक कई मामलों में अकेले ही सुनवाई कर निर्णय लेती हैं।
यह प्रक्रिया न केवल अनुचित है, बल्कि न्याय की भावना के भी विपरीत है।

सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि आयोग की कार्यवाही और जनसुनवाई में बाहरी वकीलों और काउंसलरों को शामिल किया जाता है, जो कर्मचारियों पर दबाव बनाते हैं और गोपनीयता भंग करते हैं। कुछ बाहरी लोग बिना अनुमति के सुनवाई कक्ष में मौजूद रहते हैं, पक्षकारों से बातचीत करते हैं और यहां तक कि नोटशीट तक पढ़ते हैं—जो नियमों का खुला उल्लंघन है।
राजनीतिक पूर्वाग्रह के भी आरोप
ज्ञापन में यह भी उल्लेख है कि अध्यक्ष के चेंबर में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सोनिया गांधी की तस्वीरें लगी हैं, जबकि यह एक संवैधानिक पद है, जिस पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की तस्वीरें होनी चाहिए।
सदस्यों का कहना है कि इससे आयोग की राजनीतिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
“सुकमा में एक भी जनसुनवाई नहीं हुई”
सदस्य लक्ष्मी वर्मा ने कहा कि सुकमा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आज तक एक भी जनसुनवाई नहीं हुई है, जिससे वहां की महिलाओं को न्याय नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि अध्यक्ष की कार्यशैली में पारदर्शिता नहीं है और न्यायपीठ की पूरी तरह अनदेखी की जा रही है।
पद से हटाने पर कोर्ट ने लगाई थी रोक
गौरतलब है कि भाजपा सरकार के गठन के बाद डॉ. किरणमयी नायक को अध्यक्ष पद से हटाने का निर्णय लिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। न्यायमूर्ति एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ ने उन्हें पद से हटाने पर रोक लगाई थी और सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश भी दिए थे।
अब निगाहें सरकार की प्रतिक्रिया पर
सदस्यों ने कहा कि बाहरी लोगों को शामिल कर आयोग की मर्यादा और गोपनीयता दोनों को खतरे में डाला जा रहा है।
उन्होंने मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों से शिकायत करने की बात कही है।
अब देखना होगा कि सरकार इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेती है, क्योंकि महिला आयोग में आंतरिक कलह और कार्यप्रणाली की अनियमितता महिलाओं को न्याय दिलाने की प्रक्रिया पर सीधा असर डाल सकती है।



