यक्ष पंरतु कुछ अनुत्तरित प्रश्न : क्या मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान जरूरतमंदों के लिए है या प्रभाव एवं पहुंच का लाभ उठाने का माध्यम है ? आज कल कुछ ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जो व्यवस्था और संगठन दोनों के सामने गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार एक ही व्यक्ति द्वारा मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान से अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देकर स्वयं के लिए ₹1 लाख, अपने बड़े भाई के बच्चों की शिक्षा के लिए ₹2 लाख तथा माता-पिता के इलाज के नाम पर ₹2 लाख कुल मिलाकर ₹5 लाख की सहायता प्राप्त की है।

जबकि संबंधित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, बच्चों की वास्तविक शैक्षणिक स्थिति और माता-पिता के इलाज की आवश्यकता को लेकर गंभीर सवाल हैं ? यदि प्रस्तुत परिस्थितियां वास्तविकता से मेल नहीं खातीं तो यह शासन की जनकल्याणकारी राशि के दुरुपयोग और वास्तविक जरूरतमंदों के अधिकारों के साथ अन्याय का विषय है। यक्ष पंरतु अनुत्तरित प्रश्न यही है…………
विडंबना देखिए एक तरफ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐसे हजारों समर्पित कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपना जीवन संगठन और राष्ट्र कार्य के लिए समर्पित कर दिया। विपक्ष में रहने के दौरान हो या कठिन और विपरीत परिस्थितियों में जिन्होंने पार्टी का झंडा थामे रखा, आज उनमें से अनेक कार्यकर्ता उपेक्षा और आर्थिक कठिनाइयों के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
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संघ के अनेक प्रचारक और विस्तारक जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र कार्य को समर्पित किया। गृहस्थ जीवन में लौटने के बाद स्वाभिमान के साथ आजीविका चलाने के लिए कोई सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहा है, कोई सब्जी बेच रहा है और तो और कुछ तो शराब दुकान तक में सेल्समैन का काम कर रहे है। इनका स्वाभिमान देखिए, कठिन परिस्थितियों में भी किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय मेहनत की कमाई से जीवन जीना पसंद कर रहे हैं। साथ ही पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर भी हैं।
सवाल यह है कि ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं की चिंता कौन करेगा ? जिन्होंने अपना सर्वस्व संगठन को दिया, उनके लिए ₹5,000 और ₹10,000 की सहायता राशि जुटाना भी कठिन हो जाता है, लेकिन दूसरी ओर कुछ लोग प्रभाव, पहचान और कथित रूप से भ्रामक परिस्थितियों का हवाला देकर शासन की योजनाओं का लाभ उठाने में पीछे नहीं रहते। हमारा तो स्पष्ट मानना है कि मुख्यमंत्री स्वेच्छा अनुदान किसी की व्यक्तिगत पहुंच, चापलूसी अथवा प्रभाव का पुरस्कार नहीं होना चाहिए। यह वास्तव में असहाय, गरीब, बीमार और जरूरतमंद परिवारों के लिए एक सहारा है।
संगठन समर्पण से चलता है, चापलूसी से नहीं, राष्ट्रकार्य त्याग से होता है, दिखावे से नहीं…..
आज आवश्यकता इस बात की है कि उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान और सम्मान की चिंता हो, जिन्होंने अपना बहुमूल्य जीवन संगठन और राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। दुख इस बात का है कि समर्पण करने वाले उपेक्षित हैं और स्वार्थ सिद्ध करने वाले लाभान्वित हो रहे हैं।
अरे हां…..
पंडरी में 8 साल की मासूम बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था। तब पार्टी के वरिष्ठजन फोटो खींचानें आये थे उस बच्ची की मदद ये लोग आज तक नहीं किये। हम पूछते हैं कि कितनी और किसने मदद की ? पंरतु उससे मिलने की खबर हर न्यूज़ चैनल और पेपर में चलवा रहे थे, लेकिन जब मदद की बारी आई तो सबसे पहले यही लोग ग़ायब हों गए।
विधायक जी से अनुरोध है थोड़ी इनकी भी मदद कर दे….?




