पुरुलिया। देशभर में शारदीय नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की पूजा धूमधाम से की जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा अपनी अनूठी परंपरा के लिए जानी जाती है। यहां मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा साल के करीब 360 दिन बैंक लॉकर में सुरक्षित रखी जाती है। केवल दुर्गा पूजा के अवसर पर प्रतिमा को बाहर निकालकर राजबाड़ी लाया जाता है। षष्ठी के दिन पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच मां की प्रतिमा राजबाड़ी पहुंचती है और पूजा संपन्न होने के बाद दशमी को वापस बैंक लॉकर में रख दी जाती है।
करीब 400 साल पुरानी इस परंपरा को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक जयपुर पहुंचते हैं। स्वर्ण प्रतिमा के साथ चांदी का भव्य चालचित्र इस पूजा का प्रमुख आकर्षण है।
सपने में मिला था स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत
राजपरिवार से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा का इतिहास लगभग चार शताब्दियों पुराना है। कहा जाता है कि राजा जयसिंह के समय से यहां राजपरिवार की धार्मिक परंपराओं की शुरुआत हुई थी। शुरुआती दौर में मां दुर्गा की पूजा मिट्टी की प्रतिमा के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों से की जाती थी।
बाद में राजा काशीनाथ सिंह के समय पूजा के दौरान मंदिर में आग लगने की घटना हुई। इसके बाद राजा ने मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया। राजपरिवार से जुड़ी मान्यता है कि राजा को स्वप्न में मां दुर्गा ने स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का संकेत दिया था। इसके बाद बनारस के कुशल कारीगरों को बुलाकर मां की स्वर्ण प्रतिमा और चांदी का चालचित्र तैयार कराया गया।
चोरी की घटना के बाद बैंक लॉकर में रखी जाने लगी प्रतिमा
जयपुर राजबाड़ी में चोरी की एक घटना के बाद मां दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला लिया गया। बताया जाता है कि चोर राजबाड़ी से कई कीमती सामान और आभूषण चुराकर ले गए थे। इसके बाद पुलिस की सलाह पर स्वर्ण प्रतिमा को पूजा के दिनों को छोड़कर पूरे साल बैंक लॉकर में सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई।
तब से यह परंपरा लगातार चली आ रही है। दुर्गा पूजा के दौरान प्रतिमा को पुलिस सुरक्षा में राजबाड़ी लाया जाता है और अनुष्ठान पूरा होने के बाद दोबारा बैंक लॉकर में रख दिया जाता है। प्रतिमा की सुरक्षा के लिए पूजा के दौरान विशेष इंतजाम किए जाते हैं।
द्विभुजा स्वरूप में विराजती हैं मां दुर्गा
जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा का एक और खास आकर्षण मां दुर्गा की द्विभुजा स्वर्ण प्रतिमा है। आमतौर पर दुर्गा पूजा में मां के पारंपरिक बहुभुजा स्वरूप के दर्शन होते हैं, जबकि यहां मां की प्रतिमा का स्वरूप अलग है। इसके साथ मौजूद चांदी का चालचित्र भी पूजा की ऐतिहासिक और कलात्मक विरासत को दर्शाता है।
यही विशिष्टता इस पूजा को दूसरी जगहों की दुर्गा पूजा से अलग पहचान देती है। मां के दर्शन करने के लिए पुरुलिया के अलावा पश्चिम बंगाल के अन्य जिलों और दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं।
राजसी वैभव से जुड़ी है पूजा की परंपरा
राजपरिवार के सदस्य प्रशांत नारायण सिंह देव के मुताबिक, जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा कई पीढ़ियों से आयोजित होती आ रही है। उन्होंने बताया कि समय के साथ पूजा की परंपराओं और व्यवस्थाओं में बदलाव हुए हैं, लेकिन मां दुर्गा की आराधना का सिलसिला जारी है। सुरक्षा कारणों से स्वर्ण प्रतिमा को बैंक लॉकर में रखने की व्यवस्था भी इसी परंपरा का हिस्सा बन चुकी है।
राजबाड़ी की पुरानी परंपराओं से जुड़ी रूनी बनर्जी के अनुसार, पहले दुर्गा पूजा का आयोजन बेहद भव्य होता था। राजबाड़ी में हाथियों, घोड़ों और बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी से उत्सव का राजसी स्वरूप दिखाई देता था। समय के साथ व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन पूजा के प्रति लोगों की आस्था और आकर्षण आज भी कायम है।
षष्ठी से दशमी तक होते हैं मां के दर्शन
जयपुर राजबाड़ी में दुर्गा पूजा के दौरान षष्ठी से विशेष धार्मिक अनुष्ठान शुरू होते हैं। इन दिनों स्वर्ण प्रतिमा राजबाड़ी में स्थापित रहती है और श्रद्धालुओं को मां के दर्शन का अवसर मिलता है। दशमी के दिन पूजा संपन्न होने के बाद प्रतिमा को फिर से पुलिस सुरक्षा के बीच बैंक लॉकर में सुरक्षित पहुंचा दिया जाता है।
करीब 400 साल पुरानी आस्था, स्वर्ण प्रतिमा, चांदी का चालचित्र और सुरक्षा की अनूठी व्यवस्था जयपुर राजबाड़ी की दुर्गा पूजा को विशिष्ट बनाती है। यहां मां दुर्गा के दर्शन केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, राजपरिवार की विरासत और सदियों से चली आ रही परंपरा से जुड़ने का अवसर भी हैं।




