जगदलपुर। झीरम घाटी हत्याकांड में एनआईए की विशेष अदालत द्वारा 10 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद अब सर्व आदिवासी समाज ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है। जगदलपुर के परपा में हुई बैठक में बस्तर संभाग के करीब 6-7 जिलों से समाज के प्रतिनिधि और प्रभावित परिवारों के सदस्य शामिल हुए। बैठक में समाज के कुछ लोगों ने दावा किया कि सजा पाए लोगों का झीरम हमले से सीधा संबंध नहीं था और उन्हें गलत तरीके से मामले में आरोपी बनाया गया।
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एनआईए की विशेष अदालत ने 16 सितंबर को 2013 के झीरम घाटी हमले के मामले में 10 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील का रास्ता खुला है और मृत्युदंड के क्रियान्वयन के लिए हाईकोर्ट की पुष्टि आवश्यक है।
ग्रामीण बैठकों में शामिल होने को लेकर उठाए सवाल
बैठक में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में होने वाली बैठकों में गांव के लोगों का शामिल होना सामान्य बात है। उनके मुताबिक, केवल ऐसी बैठकों में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति को नक्सली गतिविधियों से जोड़ना उचित नहीं है।
समाज का दावा है कि जिन लोगों को इस मामले में दोषी ठहराया गया है, उनमें कुछ ऐसे लोग भी हैं जो घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे। प्रभावित परिवारों की ओर से भी बैठक में इसी तरह के दावे किए जाने की बात कही गई।
हर परिवार से 20 रुपये जुटाने की योजना
सर्व आदिवासी समाज ने फैसला लिया है कि इस मामले की कानूनी लड़ाई के लिए गांव-गांव और परिवार-परिवार से आर्थिक सहयोग जुटाया जाएगा। इसके तहत प्रत्येक परिवार से 20 रुपये चंदा लेने की बात कही गई है।
समाज के पदाधिकारियों के मुताबिक, पहले एनआईए कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। वहां से राहत नहीं मिलने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई जारी रखने की तैयारी है।
‘फैसले से संतुष्ट नहीं’—समाज अध्यक्ष
सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने कहा कि प्रभावित परिवारों के साथ बैठक में एनआईए कोर्ट के फैसले को लेकर असंतोष सामने आया। उनके मुताबिक, प्रभावित परिवारों का कहना है कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, वे घटना में शामिल नहीं थे और न ही नक्सली गतिविधियों में उनकी भूमिका थी।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली बैठकों में जाना अपने आप में किसी व्यक्ति की नक्सली गतिविधियों में संलिप्तता साबित नहीं करता। समाज अब फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।
वहीं जिला अध्यक्ष गंगा नाग ने कहा कि प्रभावित परिवारों से चर्चा के बाद समाज ने इन लोगों के पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि झीरम हमले के पीछे जिन लोगों को समाज वास्तविक जिम्मेदार मानता है, उनमें से कुछ अब भी कानूनी कार्रवाई से बाहर हैं। यह उनका आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं की गई है।
झीरम घाटी हमले से जुड़े मामले में अदालत के फैसले के बाद अब एक ओर दोषियों को सुनाई गई सजा की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, वहीं सर्व आदिवासी समाज की ओर से प्रस्तावित अपील इस मामले को न्यायिक समीक्षा के अगले चरण में ले जाने की तैयारी है।




