जगदलपुर। बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी लोक आस्था की अनूठी तस्वीर ग्राम पंचायत घाट कवाली में देखने को मिली। जिला मुख्यालय जगदलपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में पारंपरिक ‘नया खानी’ (नवाखाई) तिहार की तैयारियां शुरू हो गई हैं। तिहार मनाने से पहले ग्रामीणों ने पुरखों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए इंद्रावती नदी के तट पर विशेष पूजा-अनुष्ठान किया।
ग्रामीणों ने इंद्रावती नदी को जीवनदायिनी मानते हुए जल की देवी ‘जलनी आया’ की विधिवत पूजा की। इस दौरान उन्हें प्रतीकात्मक रूप से सोने की नाव और चांदी का पतवार अर्पित किया गया। ग्रामीणों ने जलनी आया से गांव में सुख-समृद्धि, अच्छी फसल, उत्तम स्वास्थ्य और बिना किसी बाधा के नवाखाई तिहार संपन्न होने की कामना की।

जलनी आया की अनुमति के बाद शुरू होगा तिहार
घाट कवाली के ग्रामीणों के बीच मान्यता है कि इंद्रावती नदी और जलनी आया गांव के जीवन का आधार हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले जलनी आया की अनुमति और आशीर्वाद लेना जरूरी है। इसी परंपरा के तहत नदी किनारे यह विशेष सेवा अर्जी आयोजित की गई।
पूजा के दौरान गांव के बैगा, सिरहा, पुजारी और मांझी सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण इंद्रावती के घाट पर पहुंचे। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद गांव के माटी पुजारी और बुजुर्गों ने सभी ग्रामीणों के कल्याण, भरपूर अन्न-धन और खुशहाली की कामना की।
नई फसल के स्वागत का पर्व है नया खानी
बस्तर में नया खानी तिहार का कृषि और लोक जीवन से गहरा संबंध है। नई फसल के घर आने की खुशी में मनाए जाने वाले इस पर्व में खेतों से प्राप्त नई फसल, विशेषकर धान, को सबसे पहले देवी-देवताओं और पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद ही ग्रामीण नई फसल का सेवन करते हैं।
घाट कवाली में भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पहले जलनी आया से अनुमति ली गई। पूजा-अनुष्ठान के बाद अब ग्रामीणों में बुधवार को नवाखाई तिहार मनाने को लेकर उत्साह है।
कई गांवों के ग्रामीण हुए शामिल
इस पारंपरिक घाटजात्रा में घाट कवाली के माटी पुजारी मंगतू कश्यप, ग्राम पटेल लच्छू कश्यप, ग्राम सिरहा सीताराम और श्यामसुंदर कश्यप सहित कुलधर कश्यप, गिरधर कश्यप, लखेश्वर कश्यप, जुगल बघेल, सोनधर निषाद, सोनसाय मौर्य और संपत कश्यप समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
इसके अलावा करंजी, भाटपाल, मरलेंगा, केसापुर, सुरीभाटा और किंजोली गांवों से भी ग्रामीण इस आयोजन में शामिल हुए। इंद्रावती नदी के तट पर हुए इस पारंपरिक अनुष्ठान ने बस्तर की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई, जिसमें प्रकृति, कृषि और लोक आस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।




