DNA Test Case: कहते हैं कि मौत के बाद इंसान को सम्मानजनक विदाई मिलनी चाहिए, लेकिन छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से सामने आया यह मामला इस कहावत पर करारा तमाचा है। जिले के बाजार पारा इलाके का एक गरीब परिवार पिछले दो महीनों से अपने बेटे के शव के लिए पुलिस और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। विडंबना यह है कि अपने ही बेटे का अंतिम संस्कार करने के लिए परिवार आज भी सरकारी कागज—DNA रिपोर्ट—का इंतजार कर रहा है।
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मामले की शुरुआत नवंबर 2025 में हुई थी, जब मानपुर रिंग रोड स्थित एक कुएं से एक अज्ञात युवक का शव बरामद किया गया। शुरुआती जांच में पुलिस ने गंभीर लापरवाही बरतते हुए शव की पहचान चंद्रपुर निवासी पुरुषोत्तम के रूप में कर दी और शव उसके परिजनों को सौंप दिया। मामला उस वक्त हैरतअंगेज मोड़ पर पहुंच गया, जब मृत घोषित किया गया युवक दो दिन बाद जीवित अपने घर लौट आया।
पुलिस की इस भारी चूक ने न सिर्फ विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि शव की असली पहचान को लेकर नया संकट भी खड़ा हो गया।
महुआ पारा की महिला ने बेटे के रूप में की पहचान
काफी मशक्कत के बाद सूरजपुर के महुआ पारा की रहने वाली श्यामा देवांगन ने कुएं से मिले शव की पहचान अपने बेटे केशव देवांगन के रूप में की। पहले हुई गंभीर गलती से सबक लेते हुए पुलिस ने इस बार शव सौंपने से पहले DNA टेस्ट कराने का फैसला लिया और सैंपल जांच के लिए रायपुर भेजे गए।
हालांकि DNA सैंपल भेजे हुए दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक रिपोर्ट नहीं आई है। रिपोर्ट के अभाव में पुलिस शव परिजनों को सौंपने में असमर्थ है, जिसके चलते परिजन आज तक अपने बेटे का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए हैं। समय के साथ परिवार का दर्द और पीड़ा बढ़ती जा रही है।
पुलिस विभाग की ओर से लगातार यही कहा जा रहा है कि DNA रिपोर्ट जल्द आ जाएगी और रिपोर्ट मिलते ही आगे की कार्रवाई कर शव परिजनों को सौंप दिया जाएगा। सूरजपुर के एडिशनल एसपी संतोष कुमार महतो ने बताया कि रिपोर्ट मिलते ही आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि मृतक का परिवार बेहद गरीब और असहाय है। मां दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा कर परिवार का पेट पालती है, जबकि पिता विकलांग हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं।
सवालों के घेरे में सिस्टम
न परिवार के पास इतने संसाधन हैं कि वे रोजाना पुलिस दफ्तरों के चक्कर लगा सकें, और न ही इतनी पहुंच कि सिस्टम पर दबाव बना सकें। एक ओर माता-पिता अपने जवान बेटे को खोने के सदमे से उबर नहीं पाए हैं, वहीं दूसरी ओर सिस्टम की कछुआ चाल उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर एक गरीब परिवार को अपने ही बेटे के अंतिम संस्कार के लिए महीनों तक इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?



