रायपुर, 27 अप्रैल। VIP vs Common Man : राजधानी रायपुर में ट्रैफिक पुलिस की कार्रवाई अब गंभीर सवालों के घेरे में है। एक ओर आम नागरिकों पर रिकॉर्ड स्तर पर चालान की कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी वाहनों और प्रभावशाली लोगों को कथित तौर पर राहत मिलने के आरोप सामने आ रहे हैं। खासकर ड्रिंक एंड ड्राइव मामलों में प्रक्रिया के पालन को लेकर भी विवाद बढ़ता जा रहा है।
रिकॉर्ड चालान, बढ़ा राजस्व
जनवरी से मार्च 2026 के बीच ट्रैफिक पुलिस ने 2 लाख 4 हजार से ज्यादा चालान काटे, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह संख्या करीब 30 हजार थी। यानी कार्रवाई में करीब साढ़े छह गुना वृद्धि दर्ज की गई। इन तीन महीनों में 5 करोड़ 64 लाख रुपए से अधिक का जुर्माना वसूला गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग दोगुना है।
सरकारी गाड़ियां क्यों बाहर?
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इस पूरी कार्रवाई में सरकारी वाहनों का एक भी चालान दर्ज नहीं किया गया। ट्रैफिक अधिकारियों का कहना है कि सरकारी गाड़ियों पर चालान नहीं काटा जाता, जबकि परिवहन नियमों के अनुसार कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है। ऐसे में यह अंतर लोगों के बीच असंतोष और संदेह पैदा कर रहा है।
ड्रिंक एंड ड्राइव में प्रक्रिया पर सवाल
ड्रिंक एंड ड्राइव मामलों में भी गंभीर आरोप लगे हैं। कई वाहन चालकों का कहना है कि बिना ब्रेथलाइज़र टेस्ट का प्रिंटआउट दिए या मेडिकल जांच कराए सीधे कोर्ट भेजा जा रहा है। कुछ मामलों में केवल मुंह से शराब की गंध के आधार पर कार्रवाई करने की शिकायतें भी सामने आई हैं, जो कानूनी रूप से कमजोर मानी जाती हैं।
मशीनों की विश्वसनीयता पर भी चर्चा
ब्रेथलाइज़र मशीनों के नियमित कैलिब्रेशन और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि जांच प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी, तो कार्रवाई की विश्वसनीयता पर असर पड़ना तय है।
चुनिंदा कार्रवाई का आरोप
लोगों का कहना है कि जांच के दौरान सभी वाहनों को नहीं रोका जाता, बल्कि कुछ चुनिंदा गाड़ियों को ही टारगेट किया जाता है। इससे अभियान की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
नियम क्या कहते हैं?
ब्रेथलाइज़र टेस्ट ड्रिंक एंड ड्राइव का प्राथमिक साक्ष्य होता है।
30 mg/100 ml से अधिक अल्कोहल स्तर होने पर ही अपराध माना जाता है।
टेस्ट से इनकार या विशेष परिस्थितियों में ही मेडिकल जांच आवश्यक होती है।
केवल गंध के आधार पर कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर होती है।
नियम सरकारी और निजी, सभी वाहनों पर (VIP vs Common Man) समान रूप से लागू होते हैं।
भरोसे पर असर
हालांकि आंकड़े रिकॉर्ड कार्रवाई दिखा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों का भरोसा कमजोर होता नजर आ रहा है।पारदर्शिता और समानता की कमी के आरोपों ने इस अभियान को “सुरक्षा” से ज्यादा “वसूली” की छवि दे दी है।



