RNN ब्यूरो
रायपुर/राजनांदगांव। जिले के सहकारिता विभाग के अंतर्गत आने वाली सेवा सहकारी समितियों में कथित अवैध नियुक्तियों का मामला तेजी से तूल पकड़ता जा रहा है। सेवा सहकारी समिति, झिथराटोला और नवगठित समिति घुपसाल में हाल ही में हुई दो नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता, नियमों के पालन और प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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एक ही दिन दो आदेश – संयोग या पूर्व नियोजित?
1 अप्रैल 2026 को उप आयुक्त सहकारिता, राजनांदगांव द्वारा दो अहम आदेश जारी किए गए थे – आदेश क्रमांक 361: शुभम कांडे को नवगठित सेवा सहकारी समिति घुपसाल का प्रभारी प्रबंधक नियुक्त किया गया। आदेश क्रमांक 362: सौम्य कांडे को झिथराटोला समिति में लिपिक सह कंप्यूटर ऑपरेटर पद पर नियुक्त करने का आदेश पारित किया गया। दोनों आदेश एक ही दिन जारी होने से स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज संयोग है या पहले से तयशुदा प्रक्रिया के तहत फैसला लिया गया।

बिना विज्ञापन भर्ती — नियमों के उल्लंघन के आरोप
सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि किसी भी पद के लिए सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं किए गये और ना ही आवेदन आमंत्रित नहीं किए गए, कोई चयन प्रक्रिया परीक्षा या साक्षात्कार नहीं किए गए। जबकि सहकारी संस्थाओं में भर्ती के लिए सेवा नियम 2018 के तहत स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है और इस प्रकार सीधे नियुक्ति आदेश जारी करना नियमों की अनदेखी माना जा रहा है।

रिश्तेदारी और प्रभाव का आरोप, अधिकारी पर उठे सवाल
पूरे मामले में सहकारिता मंत्री के ओएसडी और अपेक्स बैंक के प्रबंध संचालक के.एन.कांडे का नाम चर्चा में है। पूरे मामले ने विस्फोटक स्वरूप इसलिए लिया क्योंकि के.एन. कांडे वर्तमान में सहकारिता मंत्री के ओएसडी (विशेष कर्तव्य अधिकारी) और अपेक्स बैंक के प्रबंध संचालक (एमडी) बताए जाते हैं और उन्होंने पद का दुरुपयोग और अपने प्रभाव का गलत इस्तेमाल किया। आरोप है कि नियुक्ति पाने वाले दोनों व्यक्तियों का उनसे करीबी रिश्तेदारी का संबंध है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे लेकर तीखी चर्चाएं चल रही हैं।
अस्तित्व में आने से पहले ही प्रभार सौंपा
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि नवगठित समिति घुपसाल को पूरी तरह अस्तित्व में आने से पहले ही प्रभारी प्रबंधक का प्रभार सौंप दिया गया। विधि विशेषज्ञ इसे प्रक्रिया की गंभीर विसंगति मानते हैं।
पुराने कार्यकाल से भी जुड़े आरोप
यह भी दावा किया जा रहा है कि के.एन. कांडे के पूर्व कार्यकाल के दौरान जब वे मां दंतेश्वरी सहकारी शक्कर कारखाना, बालोद में बतौर प्रबंध संचालक थे, तब भी अवैध नियुक्तियों और आर्थिक गड़बड़ियों के मामले सामने आए थे।
प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठे , पूरे मामले की जांच की मांग तेज
इस प्रकरण ने सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि बिना प्रक्रिया के नियुक्तियां होती रहीं तो ये जंगलराज है। इस पूरे प्रकरण में नियुक्ति व्यवस्था सहित सहकारिता के क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी साफ दिख रही है।
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मामले के सामने आने के बाद अब उच्च स्तरीय जांच की मांग जोर पकड़ रही है और इसकी शिकायत विभागीय मंत्री सहित मुख्यमंत्री से भी की गई है। सभी नियुक्तियों को रद्द करने और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की संभावना है। हालांकि इस पूरे मामले में अब तक जिला प्रशासन और राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पर प्रश्नचिन्ह यह है कि क्या सहकारी समितियों में नियुक्तियों के लिए तय नियमों को दरकिनार कर प्रभाव और रिश्तों के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं? अब राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि “सरकार” इस मामले में निष्पक्ष जांच कराती है या नहीं ?



