रायपुर। देश की आंतरिक सुरक्षा और विकास के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रहा नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यह केवल सुरक्षा बलों की सफलता नहीं, बल्कि मजबूत नीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और केंद्र-राज्य के बेहतर समन्वय का परिणाम है। यह बात छत्तीसगढ़ के पूर्व गृह मंत्री और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कही।
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उन्होंने कहा कि नक्सलवाद का यह पतन इस तथ्य को साबित करता है कि बंदूक की ताकत लोकतंत्र की सामूहिक शक्ति के सामने टिक नहीं सकती। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि दशकों के संघर्ष, बलिदान और रणनीतिक निरंतरता का परिणाम है।
अग्रवाल ने इस अवसर पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, कोबरा कमांडो, छत्तीसगढ़ पुलिस और स्थानीय सुरक्षाबलों के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि यह विजय उनके अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण की गाथा है।
नक्सलबाड़ी से रेड कॉरिडोर तक का विस्तार
भारत में नक्सलवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई, जिसकी जड़ें उग्र वामपंथी विचारधारा में थीं। समय के साथ यह आंदोलन देश के वनांचल और आदिवासी क्षेत्रों में फैलता गया और तथाकथित “रेड कॉरिडोर” का रूप ले लिया। छत्तीसगढ़, जिसका बड़ा हिस्सा वनाच्छादित है, इस गतिविधि का प्रमुख केंद्र बन गया। विशेषकर अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने बने रहे।
विचारधारा से भटककर उगाही तंत्र में बदला आंदोलन
अग्रवाल ने कहा कि समय के साथ नक्सलवाद अपनी मूल विचारधारा से भटककर हिंसा और अवैध वसूली का माध्यम बन गया। बस्तर और सरगुजा क्षेत्रों में नक्सलियों ने समानांतर सत्ता स्थापित कर भय का माहौल बनाया और खनन, तेंदूपत्ता व्यापार व विकास परियोजनाओं से जुड़े लोगों से जबरन वसूली की।
नीतिगत कमजोरी से मिला विस्तार
उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान नक्सलवाद के खिलाफ स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव रहा, जिसके चलते यह समस्या 12 राज्यों के करीब 180 जिलों तक फैल गई। उस दौर में इसे सामाजिक-आर्थिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, जिससे निर्णायक कार्रवाई प्रभावित हुई।
राष्ट्रीय दृष्टिकोण से लड़ी गई लड़ाई
अग्रवाल ने अपने छात्र जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि बस्तर में काम के दौरान उन्होंने नक्सलवाद की जमीनी हकीकत को करीब से देखा। उन्होंने कहा कि इस समस्या का समाधान केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से संभव हुआ।
उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में हुई एक अहम बैठक में यह तय किया गया कि नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष को राष्ट्रीय एकता और अखंडता के व्यापक संदर्भ में लड़ा जाएगा, जो आगे चलकर निर्णायक साबित हुआ।



