पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक )
रायपुर. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक श्री रामचंद्र स्वामी ट्रस्ट नागरीदास मंदिर ट्रस्ट की सैकड़ों एकड़ जमीनों का विवाद एक बार फिर उठ गया है और इस बार यह मामला विधानसभा तक गूंज गया है। रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू द्वारा विधानसभा में उठाये गये एक सवाल के जवाब में सरकार की तरफ से राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने अपने जवाब में कई अति महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं।
सरकार ने अपने जवाब में भी माना है कि ट्रस्ट की जमीन को लीज पर देने के लिए आवेदन मिले, अनियमितताओं की शिकायत दर्ज हुई और राजस्व रिकॉर्ड में जमीन के रकबे में भी भारी अंतर पाया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ट्रस्ट की जमीन का पूरा सच क्या है और क्या यह ट्रस्ट संपत्तियों में डकैती नहीं है ?
विधानसभा में रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू ने सरकार को घेरा “ट्रस्ट की कुल कितनी जमीनें और विक्रय के बाद शेष कितनी ?
विधानसभा में अपने सवाल में विधायक साहू ने पूछा है कि स्वामी रामचंद्र स्वामी नागरीदास मंदिर ट्रस्ट की किस-किस गांव में कितनी जमीनें है, क्या ट्रस्ट भंग होने के बाद भी जमीन लीज पर देने के आवेदन मिले और की गई इन अनियमितताओं पर क्या कार्रवाई हुई ?

सरकार का जवाब !
पूछें गये सवाल के जवाब में राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने बताया कि ट्रस्ट के नाम रायपुर, चरौदा, मंदिरहसौद, परसही, डंगनिया और महासमुंद के टेंगना सहित कई स्थानों पर जमीन दर्ज है। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार ट्रस्ट के पास रायपुर खास में 4.361 और 0.316 हेक्टेयर, डंगनिया में 0.619 हेक्टेयर, मंदिरहसौद में 107.391 हेक्टेयर, टेंगना जिला – महासमुंद में 10.250 हेक्टेयर, चरौदा में 58.353 हेक्टेयर और ग्राम परसही में 2.730 हेक्टेयर भूमि दर्ज है। उन्होंने अपने जवाब में यह तो स्वीकार किया और स्पष्ट भी किया की पंजी में दर्ज रकबे और वर्तमान राजस्व रिकार्ड के रकबों में भारी अंतर है पर क्यों अंतर है नहीं बताया।
सरकार ने कहा कि ट्रस्ट भंग नहीं हुआ था, बल्कि केवल उसकी प्रबंध समिति भंग की गई थी, पर क्या ये सच है ?
प्रकरण में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सरकार ने अपने जवाब में यह तो स्वीकार किया है कि ट्रस्ट भंग नहीं हुआ था बल्कि प्रबंध समिति भंग की गई थी। इस मामले में विधानसभा के पटल में सरकार द्वारा प्रस्तुत जवाब के अनुसार प्रबंध समिति भंग होने के बाद ट्रस्ट की जमीन को लीज पर देने के लिए दो आवेदन मिले। दोनों आवेदनों में आवेदक का नाम सत्यनारायण शर्मा, पिता जगदीश प्रसाद शर्मा लिखा गया है। एक ही व्यक्ति ने दो अलग-अलग आवेदन दिए है। पहला आवेदन ग्राम चरौदा खसरा नं. 278/1, 2.91 एकड़ भूमि को लीज पर लेने के लिए दूसरा आवेदन ग्राम चरौद खसरा नं. 509/1, 559, 560/1, 562/2, 562/3, 11 एकड़ भूमि लीज पर लेने के लिए आवेदन दिया गया था।

आवेदक सत्यनारायण शर्मा संयुक्त मघ्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में मंत्री सहित कई बार के विधायक रह चुके हैं। सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि 28 मार्च 2025 को ट्रस्ट की चरौदा और मंदिरहसौद की जमीन को लीज पर देने और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत मिली थी। जिसके आधार पर जांच शुरू हुई, इस शिकायत के आधार पर प्रकरण दर्ज किया गया और जांच के लिए तहसीलदार आरंग से रिपोर्ट मांगी गई। सरकार का कहना है कि रिपोर्ट मिलने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। पंरतु आज डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी जांच की क्या स्थिति है सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है जिससे उनकी मंशा में शक पैदा हो रहा है ? क्या रसूखदारों को बचाया जा रहा है और डकैती में सबको बंटवारा मिला है ?

विधानसभा में प्रस्तुत जवाब में कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्य आये सामने.
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने स्वयं यह बात स्वीकार कर ली है कि ट्रस्ट रजिस्टर में दर्ज जमीन और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में कई जगह रकबे का अंतर पाया गया। पंरतु रकबे में कमी की वजह स्पष्ट नहीं की गई है, पर क्यों ? क्या रकबे में कमी की वजह जमीनों की अवैध खरीदी-बिक्री रहीं ? क्योंकि रिकॉर्ड सरकार का घटाने-बढ़ाने वाले सरकारी कर्मचारी, फिर रकबे में अंतर कैसे आ गया ?

जमीनों के रकबे में कुछ फीट या मीटरों का नहीं, दर्जनों एकड़ का अंतर कैसे ? बहुत से सवाल अभी बाकी हैं ?
हालांकि सरकार ने विधानसभा में अपना जवाब दे दिया है, लेकिन कई सवाल अब भी जस की तस खड़े हैं और सोचने को मजबूर कर रहें हैं ? अगर ट्रस्ट भंग नहीं हुआ पर प्रबंध समिति भंग होने के दौरान लीज के आवेदन क्यों आए और लीज स्वीकृत कैसे हो गयी ? क्या पूरी लीज प्रक्रिया नियमों के अनुसार थी ?
इस प्रकरण में वित्तीय अनियमितताओं की शिकायत में जांच क्या कहती है और कब तक सामने आ सकेगी ? और ट्रस्ट की जमीन के रिकॉर्ड में इतना बड़ा अंतर आखिर कैसे आ गया जबकि सबकुछ सरकार के हाथों में है ? साथ ही ट्रस्ट की सैकड़ों एकड़ जमीन जिसका अधिग्रहण सरकार ने अपनी परियोजनाओं की पूर्ति हेतु किया है उसके मुआवजे के करोड़ों रुपए कहां गए ? क्या वर्षों से सरकार के अहम अधिकारी पंजीयक, सार्वजनिक न्यास सो रहे थे या आकंठ भष्ट्राचार में लिप्त है ?

यक्ष प्रश्न – क्या यह वर्तमान विधायक मोतीलाल साहू और पूर्व विधायक सत्यनारायण शर्मा की मात्र आपसी राजनैतिक रंजिश है या विधायक मोतीलाल साहू द्वारा उठाया गया सवाल ट्रस्ट की संपत्तियों पर की गई डकैती का खुलासा है ? दर्जनों एकड़ ज़मीनों को आखिरी कौन खा गया, यहां तो यह भी नहीं बोला जा सकता “आखिर जमीन खा गई या आसमान निगल लिया ?”



