महाभारत में कौरवों के जन्म की कथा सबसे रहस्यमयी घटनाओं में गिनी जाती है। राजा जन्मेजय के प्रश्न पर महर्षि वैशंपायन ने यह प्रसंग सुनाया, जिसमें बताया गया है कि आखिर महाराज धृतराष्ट्र और रानी गांधारी के 100 पुत्रों तथा एक पुत्री का जन्म कैसे हुआ।
यह भी पढ़े :- Police Transfer : छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल…! कई IG और SP के तबादले…देखें पूरी लिस्ट
महाभारत के अनुसार, ऋषि दुर्वासा से प्राप्त मंत्र के प्रभाव से देवी कुंती को देवताओं से संतान प्राप्त हुई। धर्मराज के आशीर्वाद से युधिष्ठिर और पवनदेव की कृपा से भीम का जन्म हुआ। जिस दिन भीम का जन्म हुआ, उसी दिन हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र के ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन का भी जन्म हुआ।
दो वर्ष तक गर्भ में रहा मांस का पिंड
महर्षि वैशंपायन के अनुसार, रानी गांधारी ने गर्भ तो धारण किया, लेकिन लंबे समय तक प्रसव नहीं हुआ। जब उन्हें पता चला कि कुंती युधिष्ठिर को जन्म दे चुकी हैं, तो वे अत्यंत व्यथित हो गईं। निराशा में उन्होंने अपने गर्भ पर प्रहार किया, जिससे एक कठोर मांस का पिंड बाहर निकला।
गांधारी उसे त्यागने ही वाली थीं कि तभी महर्षि वेदव्यास वहां पहुंचे। उन्होंने गांधारी को ऐसा करने से रोका और कहा कि यह उनके वरदान की ही परिणति है।
घी से भरे 100 मटकों में रखा गया पिंड
व्यासजी ने गांधारी को 100 घी से भरे मटके तैयार करने का निर्देश दिया। इसके बाद उन्होंने मांस के पिंड को 100 भागों में विभाजित किया। एक अतिरिक्त भाग भी बचा, जिससे बाद में पुत्री दु:शला का जन्म हुआ।
इन सभी भागों को अलग-अलग मटकों में सुरक्षित रखा गया। निर्धारित समय पूरा होने पर सबसे पहले एक मटके से दुर्योधन का जन्म हुआ और बाद में क्रमशः अन्य 99 पुत्र जन्मे।
दुर्योधन के जन्म पर दिखे अशुभ संकेत
महाभारत के वर्णन के अनुसार, दुर्योधन के जन्म लेते ही उसने गधे जैसी आवाज निकाली। उसी समय गधे, सियार, गिद्ध और कौए भी विचित्र स्वर में चिल्लाने लगे। तेज आंधी चली और अनेक अपशकुन दिखाई दिए।
इन संकेतों को देखकर विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को सलाह दी कि राज्य और कुल की रक्षा के लिए इस पुत्र का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य में विनाश का कारण बन सकता है। लेकिन पुत्र मोह में धृतराष्ट्र ने यह सलाह स्वीकार नहीं की।
100 पुत्र, एक पुत्री और एक अन्य पुत्र
महाभारत के अनुसार, गांधारी के 100 पुत्रों के जन्म के लगभग एक महीने बाद उनकी पुत्री दु:शला का जन्म हुआ। वहीं, धृतराष्ट्र की सेवा में रहने वाली एक वैश्य स्त्री से उनके एक अन्य पुत्र युयुत्सु का भी जन्म हुआ। इस प्रकार धृतराष्ट्र की कुल 102 संतानें मानी जाती हैं।
कथा के अंत में राजा जन्मेजय ने महर्षि वैशंपायन से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न किया—जब 100 कौरव लगभग एक साथ जन्मे, तो दुर्योधन को सबसे बड़ा पुत्र कैसे माना गया और उत्तराधिकार का आधार क्या था? महर्षि वैशंपायन इसके उत्तर के साथ महाभारत की अगली कड़ी सुनाने की तैयारी करते हैं।



