पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक)
रायपुर/छत्तीसगढ़ : राज्य के पुरोधाओं और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लोकहित में गठित “ग्राम सेवा समिति” की राजधानी के मध्य पंडरी में स्थित करोड़ों रुपए की भूमि के फर्जी तरीके से अदला-बदली का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। ये पूरा मामला एक संगठित गिरोह द्वारा सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए गये एक अपराध का है।
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जनवरी 2025 में ही मंहत रामआशीष दास और रहवासी बुनकर परिजनों द्वारा आयुक्त, रायपुर संभाग, कलेक्टर, रायपुर सहित सभी वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन के माध्यम से सूचित कर दिये थे कि इस पब्लिक ट्रस्ट की भूमि पर बलात् अवैध कब्ज़ा और सड़क निर्माण किया जा रहा है। और इसकी अनुमति पंजीयक सार्वजनिक न्यास, नगर निगम तथा नगर एवं ग्राम निवेश से नहीं ली गई है।

दरअसल इस पब्लिक ट्रस्ट की स्थापना आजादी के बाद लोकहित में मंहत लक्ष्मीनारायण दास, नंदकुमार दानी, व्यंकटेशराव कोहाडे जैसे छत्तीसगढ़ के सपूतों ने 1948-49 में ग्राम सेवा समिति के नाम पर किया था। अंग्रेजों के 1860 में स्थापित एक कानून के अनुसार इसका पंजीयन भी कराया। अब आप समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के उन सपूतों की दूरदर्शिता और ज्ञान को जो इस समिति को कानूनी अमलीजामा पहना कर और सब को कानूनी दायरे में लाकर सहकारिता की एक बहुत बड़ी मिसाल पेश की। 1965 में इस जमीन को समिति के सदस्यों ने 19 नये पैसे प्रति फुट के हिसाब से खरीद था। उस जमाने में एकड़ों की भूमि को फुट की दर से खरीदी करना यह बताता है की यह सहकारी समिति कितने ज्यादा प्रॉफिट में चल रही थी। यहां पर सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला था।

इस पब्लिक ट्रस्ट में कब्जा जमाने की कोशिश वर्षों से की जा रही है। ट्रस्ट में ट्रस्टी बनने के लिए अजय तिवारी द्वारा स्वयं सहित 7 व्यक्तियों का आवेदन पंजीयक सार्वजनिक न्यास को दिया गया था। जिसे तात्कालीन पंजीयक द्वारा अपने आदेश दिनांक 10/06/2024 को ही ख़ारिज कर दिया गया था।

इसके अलावा इस पब्लिक ट्रस्ट के एकमात्र जीवित सदस्य विशालराम चंद्राकर द्वारा मार्च 2025 को आवेदन प्रस्तुत कर ट्रस्ट को भंग करने का आवेदन भी प्रस्तुत किया था पंरतु उनकी मृत्यु हो जाने के कारण प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया गया। जिससे यह पता चलता है कि वर्तमान में ट्रस्ट में कोई भी ट्रस्टी नहीं है और पब्लिक ट्रस्ट होने की वजह से कलेक्टर रायपुर ही इसके पदेन अध्यक्ष है।

इसी का फायदा उठाकर भूमाफिया हरिवल्लभ अग्रवाल, स्वयंभू ट्रस्टी अजय तिवारी और इनके दलाल अखिलेश जैन ने एक विनिमय विलेख निष्पादित कर कौड़ियों के दाम की जमीन को आपस में ही अदला-बदली कर करोड़ों की जमीन को हथियाने की तैयारी कर ली है। पब्लिक ट्रस्ट होने की वजह से भूमि के क्रय-विक्रय या अदला-बदली की अनुमति पंजीयक सार्वजनिक न्यास एवं पदेन अध्यक्ष कलेक्टर, रायपुर से लेनी चाहिए थी। पंरतु इन भूमाफियों ने अनुमति पंजीयक फर्म और सोसायटी से ली। जबकि इस सार्वजनिक न्यास के गठन कर्ता और तात्कालिक न्यास मंत्री नंद कुमार दानी ने वर्ष 1971 में पैसों की आवश्यकता होने पर तात्कालिक पंजीयक सार्वजनिक न्यास, रायपुर से बकायदा लिखित अनुमति ली थी। पचास के दशक में 19 पैसे वर्ग फीट की दर से खरीदी गई इस भूमि को 1971 में विक्रय करने के लिए दर 1रूपये 10 पैसा प्रशासन ने तय की थी। तात्कालिक रूप से भूमि विक्रय से करीब-करीब छः गुना लाभ प्राप्त हो रहा था।
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इस पूरे मामले में वर्तमान में पदस्थ तहसीलदार राममूर्ति दीवान की भूमिका भी बहुत ही संदिग्ध है। क्योंकि कुछ समय पूर्व “ग्राम सेवा समिति” और हरिवल्लभ अग्रवाल की भूमि का गठित दल द्वारा सीमांकन कराने के प्रस्तुत आवेदन पर पहले शिकायत मानकर दल का गठन किया जाता है। फिर कुछ समय बाद ही तहसीलदार राममूर्ति दीवान अपने ही जारी आदेश को राजस्व नियमों का हवाला देकर खारिज कर देते हैं।
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इसमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि “ग्राम सेवा समिति” का गठन सहकारी समिति के रूप किया गया था तो कब और किसने इसका पंजीयन, फर्म और सोसायटी, छत्तीसगढ़ में करा दिया ? क्या पब्लिक ट्रस्ट एक्ट और फर्म और सोसायटी अधिनियम अलग-अलग नहीं है ? क्या एक ही समिति का पंजीयन पब्लिक ट्रस्ट और फर्म और सोसायटी दोनों में किया जा सकता है ? अब यक्ष प्रश्न यह है कि शासन-प्रशासन कब इस पूरे मामले का संज्ञान लेता है और इस आपराधिक कृत्य पर अपराध पंजीबद्ध करता है ?



