कोरबा। छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 अब सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है। एक तरफ मसीही समाज इसका विरोध कर रहा है, तो दूसरी ओर धार्मिक मंचों से इसके समर्थन में तीखे बयान सामने आ रहे हैं।
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कोरबा के ढप-ढप में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने धर्मांतरण के मुद्दे पर खुलकर बयान दिया। उनके शब्दों ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहां धर्म, आस्था और कानून तीनों आमने-सामने दिख रहे हैं। उन्होंने कथा मंच से आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय मिशनरियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि अब धर्मांतरण का खेल नहीं चलेगा। लोगों से घर लौटने का आह्वान करते हुए, उन्होंने कोरबा, रायगढ़, जशपुर और बिलासपुर के निवासियों से अपील की और कहा कि जो लोग वापस लौटना चाहते हैं, उनके लिए अब सही समय है।
‘भांचा’ बताकर जोड़ा भावनात्मक रिश्ता
धीरेंद्र शास्त्री ने धर्मांतरण के मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अब यह खेल नहीं चलेगा और जो लोग राह भटक गए हैं, उनकी घर वापसी कराई जाएगी। उनके इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने खुद को छत्तीसगढ़ का ‘भांचा’ बताते हुए प्रदेश से भावनात्मक जुड़ाव भी जाहिर किया। इस टिप्पणी को उन्होंने स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक संबंध से जोड़कर पेश किया।
बहरहाल, कथा जैसे धार्मिक मंच से इस तरह के बयान आने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह केवल धार्मिक संदेश है या फिर सामाजिक-राजनीतिक बहस को प्रभावित करने वाला मुद्दा।
जहां एक ओर मसीही समाज इस विधेयक को अपने अधिकारों पर प्रहार बता रहा है, वहीं दूसरी ओर कई हिंदू संगठनों और धार्मिक नेताओं का मानना है कि यह कानून ‘जबरन धर्मांतरण’ पर रोक लगाने के लिए जरूरी है।



