पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक )
रायपुर/छत्तीसगढ़। मनीष तिवारी एक जाबांज और छत्तीसगढ़ पुलिस का सच्चा सिपाही। राजधानी का माटी पुत्र, संस्कारित परिवार का एक ऐसा लड़का जिसके मन में देश और समाज के लिए कुछ करने का जूनून हमेशा रहा। अपने धर्मानुसार आचरण का सभी के पास संवैधानिक अधिकार है। ओछी मानसिकता और उसकी राजनीति का एक जीवंत प्रमाण है ये विवाद। भारत के प्रत्येक नागरिक के पास संवैधानिक अधिकार है जिसमें वह अपने धर्मानुसार आचरण कर सकता है। धर्मानुसार आचरण और आदर का तरीका बोसा भी है तो हाथ जोड़ना और चरण स्पर्श भी है।
90 के दशक का रायपुर जिस समय संसाधन सीमित पर शहर अपनत्व से लबरेज हुआ करता था। पुराने रायपुर के गली मोहल्ले और टिकरापारा क्षेत्र में उसके लड़कपन और जवानी दोनों को सबने देखा था। हमेशा से फोर्स में जाने का सपना, भोर की पहली रोशनी और नंगे पैर उसकी दौड़, कभी रायपुर की खुली सड़कों पर तो कभी पुलिस ग्राउंड में। पसीने से तरबतर हमेशा मुस्कान के साथ खिला हुआ चेहरा। हां मैंने देखा है मनीष के जज्बे और जूनून को। हां मैंने देखा है उसके एक और साथी माटी पुत्र संजय यादव को। जो शहीद हो गया था पुलिस अधीक्षक व्ही. के चौबे के साथ नक्सल मोर्चे में।
हम सभी हमउम्र साधारण परिवार से आने वाले नवयुवक भविष्य के सपने बुनते थे। कभी घंटों देश, समाज, राजनीति और अपने पारिवारिक मूल्यों पर चर्चा करते थे। मिला-जुला कर चाय के पैसे इकट्ठे करते और आस्मां को मुठ्ठी में भरने के एक दूसरे के इरादों को हौसला देते थे। घरों के आंगन सहित पेड़ की घनी छांव में रोड पर ही कैरम खेलते थे। आपसी चर्चा और किसी मुद्दे में मैंने कभी मनीष और संजय को चर्चा में तेज आवाज से या जबरदस्ती अपने सिद्धांतों को सही साबित करते नहीं देखा था। दोनों के पारिवारिक संस्कार और नैतिक मूल्य बहुत ऊंचे रहे हैं। नैतिकता और संस्कार में हमेशा माता पिता की बड़ी भूमिका रहती है।
खैर बात इस गंभीर मुद्दे के की मनीष तिवारी छत्तीसगढ़ पुलिस में ना सिर्फ एक अधिकारी है बल्कि पारिवारिक शिक्षा और संस्कार की वजह से हिंदू धर्मावलंबी भी है। अपने धर्म के एक कथावाचक और श्रद्धेय को अपने संस्कारों के अनुरूप आदर देना अब कब से भारतीय संविधान में अपराध हो गया ? हां उसने उस दौरान अपनी वर्दी की मर्यादा का भी पालन किया था। उसने अपने जूते और अपने माथे के संवैधानिक चिन्ह को भी उतार दिया था। फिर क्यों एक जाबांज सिपाही को धर्म की इस गंदी राजनीति में घसीटा जा रहा है ? जबकि छत्तीसगढ़ के कई बड़े राजनेता, मुख्यमंत्री, कई मंत्री सहित आला अफसर अपने तरीके से अनेको अवसर पर अपना आदर सम्मान प्रकट करते रहे हैं। फिर क्यों इस एक जाबांज सिपाही को धर्म की राजनीति का शिकार बनाया जा है जबकि उसने बस्तर के नक्सल मोर्चे सहित प्रदेश की कानून व्यवस्था को बनायें रखने के लिए अपना जीवन खपा दिया है। उसने सिर्फ अपने पारिवारिक संस्कार और धर्मानुसार आचरण किया है। मैं प्रणाम करता हूं उस माता-पिता को जिसने मनीष तिवारी जैसा जाबांज सिपाही और संस्कारी धर्मावलंबी माटी पुत्र दिया है।



