रायपुर : शारदीय नवरात्र के पावन पर्व पर हम आपको लेकर चल रहे हैं एक ऐसे धाम में, जहां आस्था, प्रकृति और रोमांच तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक के ग्राम बाघनी भांवर की पहाड़ियों के बीच, दो विशाल चट्टानों की गोद में विराजमान हैं त्रिशूल्हा माता, जिनकी महिमा सुनकर दूर-दूर से भक्त खिंचे चले आते हैं। इस बार नवरात्र में यहां 213 ज्योति कलशों की स्थापना की गई है।
बाघनी भांवर की पहाड़ियों के बीच बसा है आस्था का यह प्राचीन दरबार। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहां स्थापित प्राचीन त्रिशूल स्वयं प्रकट हुआ था और तभी से गांव की रक्षा कर रहा है। बुजुर्ग बताते हैं कि जब भी गांव पर कोई संकट आया, माता के त्रिशूल ने उसकी रक्षा की है, इसीलिए इसे त्रिशूल्हा माता कहा जाता है।
तस्वीरों में आप देख सकते हैं, हम इस वक्त मंदिर के बिल्कुल निकट हैं। यहां का नजारा ऐसा है जो आपने शायद Discovery Channel पर भी नहीं देखा होगा। माता के दरबार तक पहुंचने के लिए दो विशाल पत्थरों के बीच बनी प्राकृतिक गुफा नुमा सुरंग से होकर गुजरना पड़ता है। जैसा कि आप देख रहे हैं, श्रद्धालु इन्हीं बड़े-बड़े चट्टानों पर चढ़कर माता के दर्शन के लिए जा रहे हैं। पत्थरों पर लगे सफेद निशान ही रास्ता दिखाते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल और रहस्य यही है कि आखिर शहर और गांव को छोड़कर त्रिशूल्हा माता घने जंगल और पहाड़ों के बीच, इन चट्टानों की गोद में आकर क्यों विराजमान हुई? इसका जवाब आज भी किसी के पास नहीं है। यही रहस्य इस स्थान को और भी ज्यादा अलौकिक और चमत्कारी बनाता है।
ये आस्था ही है जो इन दुर्गम चट्टानों को भी आसान बना देती है। पहाड़ के नीचे, चट्टानों की गोद में बसी माता की गुफा में आज भी एक प्राचीन त्रिशूल स्थापित है, और इस नवरात्र में यहां 213 ज्योति कलशों की रोशनी से पूरा जंगल जगमगा रहा है।
नवरात्र में यहां का दृश्य अलौकिक हो जाता है। नौ दिनों तक 213 ज्योति कलश प्रज्ज्वलित हैं, जसगीत की गूंज सुनाई देती है और जय माता दी के जयकारों से पूरा बाघनी भांवर भक्तिमय हो उठा है। महिलाएं, पुरुष और बच्चे माता के दरबार में मत्था टेककर सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
भक्तों का अटूट विश्वास है कि जो भी सच्चे दिल से इस कठिन रास्ते को पार कर माता के दरबार में पहुंचता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। 213 ज्योति कलशों की रोशनी और जंगल के बीच छुपा माता के विराजमान होने का रहस्य, आस्था और रोमांच का ऐसा संगम ही त्रिशूल्हा माता के इस धाम को खास बनाता है।




