कोलकाता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि संघ को भाजपा या किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर देखना गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि RSS का न तो कोई राजनीतिक एजेंडा है और न ही वह किसी का विरोधी है।
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डॉ. भागवत कोलकाता में आयोजित ‘आरएसएस 100 व्याख्यान माला’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने लोगों से अपील की कि संघ को राजनीति के चश्मे से न देखा जाए।
उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए समाज को तैयार करना है। RSS किसी राजनीतिक दल या सत्ता की आकांक्षा से प्रेरित संगठन नहीं है।
संघ की स्थापना क्यों हुई?
सरसंघचालक ने संघ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा,
“संघ क्यों शुरू हुआ—इसका उत्तर एक ही वाक्य में है, भारत माता की जय। यहां भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक विशिष्ट स्वभाव, संस्कृति और परंपरा का नाम है। हमारा उद्देश्य उसी परंपरा को सशक्त करते हुए भारत को फिर से विश्व गुरु बनाना है।”
‘संघ राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं बना’
डॉ. भागवत ने कहा कि RSS किसी राजनीतिक उद्देश्य या प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं बना।
उन्होंने कहा,
“संघ न किसी परिस्थिति की प्रतिक्रिया में बना और न ही किसी के विरोध में खड़ा हुआ। इसका लक्ष्य समाज और हिंदू समाज का समग्र विकास है।”
ऐतिहासिक संदर्भ में 1857 का उल्लेख
उन्होंने इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी संघर्ष हुआ, लेकिन भारत को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद विचार मंथन हुआ कि इतने बड़े राजाओं, सेनाओं और योद्धाओं के होते हुए भी देश पराजित क्यों हुआ।
भागवत ने कहा कि उस मंथन से कई धाराएं निकलीं—
कुछ ने सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना, तो कुछ ने समाज सुधार और चेतना जागरण पर बल दिया।
स्वतंत्रता संग्राम की विभिन्न धाराएं
सरसंघचालक ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में राजाओं और सेनाओं ने संघर्ष किया, लेकिन समाज की पूर्ण सहभागिता नहीं बन पाई।
कुछ लोग जेल गए, कुछ ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाया, जबकि राजा राममोहन राय जैसे विचारकों ने पहले समाज सुधार पर जोर दिया। वहीं स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज को एकजुट करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि इन्हीं विचारों की धारा से समाज निर्माण की सोच आगे बढ़ी, जिसे RSS आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है।



