रायपुर। छत्तीसगढ़ के मस्तूरी तहसील में फर्जी जाति-प्रमाण पत्र का संगठित खेल उजागर हुआ है। राष्ट्रपति द्वारा दत्तक जनजाति घोषित बैगा समुदाय का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर ओबीसी वर्ग के 55 लोगों ने सरकारी नौकरी हासिल कर ली। कई गांवों में ऐसी शिकायतें तेज़ी से सामने आ रही हैं।
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जांच में सामने आया कि जिन लोगों के प्रमाण पत्र में बैगा दर्ज है, उनके पूर्वजों के राजस्व दस्तावेज, स्कूल रिकॉर्ड, दाखिल-खारिज और निर्वाचन आयोग के कागजों पर जाति “ढीमर” (ओबीसी) लिखी हुई है। कई मामलों में पिता ढीमर और पुत्र बैगा दर्ज मिला, जबकि कुछ प्रकरणों में पति-पत्नी की जाति अलग-अलग पाई गई—पत्नी बैगा और पति ढीमर।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर 2023 में सहायक शिक्षक के 55 पदों पर भर्ती हो चुकी है। लगभग 250 नए कास्ट सर्टिफिकेट भी तैयार कर लिए गए हैं, जिनका उपयोग आने वाली भर्तियों में करने की तैयारी है। पिछले 25 वर्षों में 926 से अधिक फर्जी जाति-प्रमाण पत्र की शिकायतें प्रशासन को मिल चुकी हैं।
पूर्व में मस्तूरी के पोंडी और आसपास के गांवों में ऐसे चार मामलों की जांच भी हुई थी। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि जिन लोगों को बैगा बताकर प्रमाण पत्र जारी हुआ था, वे वास्तव में इस जनजाति के नहीं थे। शासन ने उन्हें सेवा से बर्खास्त किया था, हालांकि वे बाद में अदालत पहुंच गए।
विधानसभा में आदिमजाति विभाग के मंत्री भी स्पष्ट कर चुके हैं कि मस्तूरी तहसील में बैगा समुदाय निवासरत नहीं है। राज्य में बैगा जनजाति केवल 6–7 जिलों में ही पाई जाती है। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 89,744 है।
सामाजिक प्रतिनिधियों और शिकायतकर्ताओं ने कहा कि कुछ ओबीसी परिवार खुद को बैगा लिखवाने के लिए दबाव बना रहे थे, जबकि उनकी संस्कृति, परंपराएं और समाजिक पहचान बैगा समुदाय से बिल्कुल अलग है। प्रशासन ने शिकायतों की पुष्टि करते हुए कहा है कि संबंधित विभागों को जांच के निर्देश दिए गए हैं और नियमों के अनुसार कार्रवाई होगी।



