कांकेर। बस्तर संभाग में धर्मांतरण विरोधी जागरूकता अब गांव-गांव तक फैलने लगी है। नक्सलियों की विकास विरोधी विचारधारा और छल-प्रपंच के दम पर धर्म परिवर्तन कराने वालों के खिलाफ अब आदिवासी समाज खुलकर सामने आने लगा है। इसी क्रम में कांकेर जिले के दुर्गूकोंदल ब्लॉक के ग्राम कोड़ेकुर्से में ग्रामीणों ने पास्टरों और पदरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया है। गांव के प्रवेश द्वार पर इस आशय का बोर्ड भी लगा दिया गया है।

ग्रामीणों ने सुबह गांव में बड़ी बैठक कर यह निर्णय लिया। उनका कहना है कि बाहरी लोग लुभावने वादों और आर्थिक प्रलोभनों के जरिए भोले-भाले ग्रामीणों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं, जिससे गांवों में सामाजिक विभाजन और तनाव की स्थिति बन रही है। इसी वजह से उन्होंने सामूहिक रूप से यह कदम उठाया है ताकि गांव की परंपरा, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द सुरक्षित रह सके।
ग्राम के गायता संपत हिड़को, अजित हिड़को, जवाहर ठाकुर, पुनऊराम तारम, ओम मरकाम, सहदेव बघेल, रघुनंदन गोस्वामी, अमरचंद जैन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे। ग्रामीणों का कहना है कि अब गांव में धर्मांतरण जैसी गतिविधियों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बस्तर संभाग के कई गांवों में बीते महीनों में ऐसे ही प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं, और अब कोड़ेकुर्से भी उसी कड़ी में जुड़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि “धर्मांतरण हमारे मूल धर्म, परंपरा और आस्था पर खतरा है, इसलिए अब हम जाग चुके हैं।”
ज्ञात हो कि इसी क्षेत्र के एक गांव में हाल ही में धर्मांतरण किए गए युवक के अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ था, जिससे गांव में कई दिनों तक तनाव की स्थिति बनी रही और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
अब बस्तर के ग्रामीण समाज में यह भावना गहराती जा रही है कि “जब जगे तभी सबेरा” — देर से ही सही, लोग अपने मूल धर्म, रीति-रिवाज और परंपराओं की ओर लौटने लगे हैं।



