पंकज विश्वकर्मा (समाचार संपादक)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डाक्टर बलीराम हेडगेवार द्वारा विजयादशमी पर्व पर 27 सितंबर 1925 को की गई थी। संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण हो गये है। आज विजयादशमी पर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्थापना का शताब्दी समारोह मना रहा है। संघ का ध्येय वाक्य है राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम”
अर्थात सब कुछ राष्ट्र को समर्पित है, मेरा कुछ नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के गौरवशाली यह शताब्दी वर्ष संगठन के त्याग, अनुशासन और राष्ट्र सेवा की अटूट यात्रा का प्रतीक है।
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संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य हिंदू समुदाय को एकजुट करने और हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए चरित्र प्रशिक्षण प्रदान करना और “हिंदू अनुशासन” स्थापित करना रहा है। संगठन का मूल उद्देश्य हिंदू समुदाय को “मजबूत” करने के लिए हिंदुत्व की विचारधारा को फैलाना है और भारतीय संस्कृति और उसके “सभ्यतागत मूल्यों” को बनाए रखने के आदर्श को बढ़ावा देना है। जहां संघ को “हिंदू वर्चस्व के आधार पर स्थापित ” के रूप में वर्णित किया गया है। वहीं पर कुछ राजनैतिक दलों द्वारा अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता का आरोप भी लगाए गये है । कांग्रेस आज भी यह आरोप लगाती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ब्रिटिश राज के साथ सहयोग किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कोई भूमिका नहीं निभाई। जो वास्तविक स्थिति से उलट है।
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स्वतंत्रता के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक प्रभावशाली हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में विकसित हुआ। जिसने कई संबद्ध संगठनों को भी जन्म दिया। जिन्होंने अपनी वैचारिक मान्यताओं और उनके विस्तार के लिए जमीनी स्तर पर ठोस कार्य भी किए हैं। संघ ने अपने ऊपर प्रतिबंध भी झेलें है। संघ को 1947 में चार दिनों के लिए प्रतिबंधित किया गया था। इसके बाद भारत सरकार द्वारा तीन बार और प्रतिबंधित किया गया है। पहली बार 1948 में जब नाथूराम गोडसे को आरएसएस का एक सदस्य बता कर प्रतिबंधित किया गया था। फिर 1975-1977 में आपातकाल के दौरान और तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद। वामपंथियों द्वारा आरएसएस की एक चरमपंथी संगठन के रूप में आलोचना की गई जो उचित प्रतीत नहीं होती है। संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं। संघ के स्वयंसेवकों का यह कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लिप्त रही हैं। संघ की इस बारे में मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहना सही नहीं है। राजनैतिक दलों द्वारा संघ की घोर आलोचना की गई है,जो वास्तविक रूप से सत्य से परे लगती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी शताब्दी यात्रा में राष्ट्रसेवा और राष्ट्रनिर्माण में अद्वितीय योगदान दिया है। समर्पण और अनुशासन के मूल मंत्र के साथ स्वयंसेवकों ने सदैव राष्ट्र को प्रथम रखा है। संघ में सरसंघचालक सर्वोच्च पद रहता है। संघ की स्थापना के बाद सरसंघचालक के रूप में डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार जिन्हें डॉक्टरजी के नाम से संबोधित किया जाता था 1925 से 1940 तक रहे,
माधव सदाशिवराव गोलवलकर जिन्हें गुरूजी के नाम से संबोधित किया जाता था 1940 से 1973 तक,
मधुकर दत्तात्रय देवरस जिन्हें बालासाहेब देवरस के नाम से संबोधित किया जाता था 1973 से 1993 तक, प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह जिन्हें रज्जू भैया के नाम से संबोधित किया गया 1993 से 2000 तक,
कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन प्रचलित नाम सुदर्शनजी 2000 से 2009 तक सरसंघचालक रहे थे। वर्तमान में 2009 से डॉ॰ मोहनराव मधुकरराव भागवत सरसंघचालक के रूप में कार्यरत हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशों में कार्यरत है। संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन अपने अपने रुप में क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। संघ से जुड़े प्रमुख संगठन जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है वो वनवासी कल्याण के साथ शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। संघ सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में परिवार के रूप सक्रिय हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी यात्रा में सामाजिक सेवा और सुधार, राहत एवं पुनर्वास, आपातकाल के विरुद्ध आंदोलन को कभी भी राष्ट्र भूला नहीं सकता और ये सैकड़ों कार्य स्वर्ण अक्षरों से अमिट रुप मे हमेशा अंकित रहेंगे।



