रायपुर : छत्तीसगढ़ का बस्तर, जहां पिछले 40 सालों से नक्सलियों का आतंक पसरा हुआ था, अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। लगातार चल रहे ऑपरेशनों, शीर्ष नेतृत्व की मौत और आत्मसमर्पणों के चलते नक्सली ढांचा तेजी से टूट रहा है। पिछले डेढ़ साल में सुरक्षा बलों ने 13 से अधिक टॉप नक्सली कमांडरों का एनकाउंटर किया है, जिससे पूरा नेटवर्क कमजोर पड़ गया है।
हिड़मा की मौत—नक्सलियों के पतन की सबसे बड़ी कड़ी
18 नवंबर को छत्तीसगढ़–आंध्र प्रदेश बॉर्डर के मरेडमिल्ली जंगल में माड़वी हिड़मा का एनकाउंटर नेक्सल मोर्चे पर सबसे बड़ा झटका साबित हुआ। सुरक्षाबलों ने उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का और चार अन्य नक्सलियों को भी मार गिराया था। हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में नक्सली संगठन की रीढ़ टूट गई है।
भूपति, रूपेश, चैतू—एक के बाद एक बड़े लीडर हथियार डाल रहे
हिड़मा के अलावा कई शीर्ष नक्सली या तो मारे गए हैं या फिर सरेंडर कर चुके हैं—
- भूपति – सरेंडर
- रूपेश – सरेंडर
- चैतू – सरेंडर
आंध्र–तेलंगाना के कई बड़े नक्सली भी हथियार डाल चुके हैं
अब केवल 8–9 बड़े कमांडर ही बच गए हैं, जिनमें देवजी, गणपति, मिशिर बेसरा, पापा राव, गणेश उइके और बारसे देवा जैसे नाम शामिल हैं।
यदि ये गिरे… तो बस्तर में नक्सलवाद का अंत तय
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यदि ये बाकी बचे टॉप कमांडर या तो मारे जाते हैं या सरेंडर करते हैं, तो नक्सल संगठन का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। निचले स्तर पर कुछ कैडर भले बचें, लेकिन नेतृत्वहीनता के कारण वे भी हिंसा का रास्ता छोड़ने को मजबूर होंगे।
बस्तर IG सुंदरराज पी का बड़ा खुलासा
बस्तर आईजी के मुताबिक—
- पहले 7 डिवीज़न और 15 एरिया कमेटी सक्रिय थीं
- माड़, केशकाल और दरभा डिवीज़न लगभग खाली हो चुके हैं
- पश्चिम बस्तर में कुछ कमांडर बचे हैं
- पूरी दंडकारण्य रेंज में अब सिर्फ 120–150 सशस्त्र नक्सली सक्रिय हैं
- यह संख्या कभी 1000 के पार हुआ करती थी।
बस्तर में 40 साल पुरानी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर
लगातार दबाव, विकास कार्यों, सरेंडर नीति और इंटेलिजेंस बेस्ड ऑपरेशनों से नक्सली ढांचा चरमरा चुका है। यदि आने वाले महीनों में बचे हुए कमांडरों पर भी कार्रवाई सफल रहती है, तो बस्तर में नक्सलवाद का लगभग पूरी तरह सफाया तय माना जा रहा है।



