रायपुर । मोजो मशरूम फैक्ट्री में की गई संयुक्त छापेमार कार्रवाई में बाल मजदूरी का हैरान करने वाला नेटवर्क उजागर हुआ है। दिल्ली मानवाधिकार आयोग, महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस की टीम ने 109 बाल मजदूरों को रेस्क्यू किया, जिनमें 68 बच्चियां और 41 बच्चे शामिल हैं।
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बच्चों की उम्र की पुष्टि के लिए दस्तावेज जांच जारी है। ये सभी असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से हैं, जिन्हें ठेकेदारों के जरिए फैक्ट्री में लाया गया था। सभी बच्चों को बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया, जहां काउंसिलिंग के दौरान उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए।
बच्चों का खुलासा:
- कुछ बच्चे 3 महीने, 6 महीने, एक साल, तो कुछ 3-3 साल से फैक्ट्री में कैद थे।
- एक कमरे में 10-15 बच्चों को ठूंसकर रखा जाता था।
- मारपीट और बच्चियों से छेड़खानी आम बात थी।
- सुबह 4-5 बजे से लेकर रात 12 बजे तक काम कराया जाता था।
- खाना भी भरपेट नहीं मिलता था, मजदूरी मांगो तो जान से मारने की धमकी मिलती थी।
छापे के दौरान टीम ने फैक्ट्री में फॉर्मेलिन के खतरनाक इस्तेमाल का भी पता लगाया। यह रसायन लंबे समय तक संपर्क में रहने पर कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है—यानी बच्चे मौत के मुंह में धकेले जा रहे थे।
जांच का सुराग कैसे मिला?
बिस्किट फैक्ट्री के एमडी राधिकेश अग्रवाल ने बताया कि जुलाई में हुई पहली छापेमारी के बाद कुछ समय तक स्थिति शांत रही। अगस्त में उन्हें फिर से बाल मजदूरी की सूचना मिली। इसके बाद उन्होंने AVA (एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन) के विपिन ठाकुर के साथ मिलकर फैक्ट्री की रेकी शुरू की।
ठेकेदार बनकर फैक्ट्री में प्रवेश करने के बाद टीम को अंदर बच्चों की मौजूदगी और अमानवीय हालातों का पता चला। सारी जानकारी दिल्ली मानवाधिकार आयोग को दी गई। दीपावली में कई बच्चे घर जाते हैं, इसलिए कार्रवाई टालकर नवंबर में प्लान तैयार किया गया और बड़ा ऑपरेशन किया गया। यह पहली घटना नहीं है। इसी साल जुलाई में भी 90 से ज्यादा बच्चों को इसी फैक्ट्री से छुड़ाया गया था। मामले में एफआईआर दर्ज है और लेबर कोर्ट में सुनवाई जारी है।



