उज्जैन। श्रावण-भाद्रपद मास की परंपरा के तहत भगवान महाकालेश्वर की अंतिम और शाही सवारी श्री महाकालेश्वर मंदिर से भव्य रूप से शुरू हुई। सवारी के दौरान बाबा महाकाल ने श्रद्धालुओं को सात अलग-अलग स्वरूपों में दर्शन दिए। सवारी को लेकर उज्जैन में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा मार्ग जयकारों से गूंज उठा।
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मंदिर से निकलकर शाही सवारी महाकाल घाटी, गुदरी चौराहा और रामानुजकोट होते हुए रामघाट पहुंची। यहां पवित्र शिप्रा नदी के जल से भगवान चंद्रमौलेश्वर और भगवान मनमहेश का पूजन-अभिषेक किया गया। धार्मिक परंपरा के अनुसार शिप्रा तट पर होने वाला यह पूजन शाही सवारी का प्रमुख हिस्सा माना जाता है।

सिंधिया परिवार से जुड़ी है ऐतिहासिक परंपरा
बाबा महाकाल की शाही सवारी का सिंधिया राजघराने से भी पुराना ऐतिहासिक संबंध रहा है। सिंधिया परिवार के अनुसार, उनके पूर्वज महाराजा राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके बाद बाबा महाकाल की सवारी की परंपरा को भी नई गति मिली।

आज भी शाही सवारी के अवसर पर सिंधिया परिवार द्वारा बाबा महाकाल की पूजा-अर्चना किए जाने की परंपरा निभाई जाती है। इसे राजपरिवार और महाकाल मंदिर के बीच सदियों पुराने आस्था, सेवा और समर्पण के संबंध की जीवंत स्मृति के रूप में देखा जाता है।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साझा की आस्था
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बाबा महाकाल की शाही सवारी से जुड़े इस ऐतिहासिक संबंध को साझा करते हुए कहा कि उज्जैन के अधिपति बाबा महाकाल की सेवा से सिंधिया परिवार का संबंध पीढ़ियों से आस्था, सेवा और समर्पण का प्रतीक रहा है।
शाही सवारी के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन और आशीर्वाद के लिए उमड़े। अंतिम शाही सवारी के साथ ही उज्जैन में महाकाल की सवारी से जुड़ी धार्मिक परंपराओं का यह प्रमुख आयोजन संपन्न हुआ।




