रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में तेंदूपत्ता (हरा सोना) की छिटपुट तोड़ाई अप्रैल 2026 के मध्य से शुरू हो गई है। आदिवासी ग्रामीण जंगलों में जाकर तेंदूपत्ता तोड़ रहे हैं और उसे सुखाकर गड्डियों (बंडलों) में तैयार कर रहे हैं। इस वर्ष सुकमा और बीजापुर जैसे अति-नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के 50 से अधिक नए गांवों में पहली बार सरकारी स्तर पर तेंदूपत्ता खरीदी की जा रही है, जिसे एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है।
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दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और जगदलपुर जिलों में 18 से 20 अप्रैल के बीच खरीदी शुरू होने की संभावना है। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में संग्रहण कार्य ने गति पकड़ ली है। राज्य सरकार ने इस वर्ष तेंदूपत्ता का समर्थन मूल्य बढ़ाकर ₹5500 प्रति मानक बोरा कर दिया है। यह कार्य मुख्य रूप से अप्रैल से जून तक चलता है, जिसमें आदिवासी महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
राज्य सरकार के अनुसार, 31 मार्च 2026 से बस्तर सहित छत्तीसगढ़ के नक्सलमुक्त होने के दावे के बीच इस बार तेंदूपत्ता संग्रहण को लेकर विशेष विस्तार किया गया है। पहली बार पूर्व नक्सल प्रभाव वाले गांव—जैसे पूवर्ती और निमाईगुड़ा—में भी खरीदी शुरू की जा रही है। अब तक इन क्षेत्रों के ग्रामीण पत्ता तोड़ने के बावजूद उसका समुचित लाभ नहीं ले पाते थे, लेकिन गांवों में ही खरीदी केंद्र खुलने से उन्हें सीधा आर्थिक फायदा मिलेगा।
प्रशासन ने बस्तर में करीब एक दर्जन नए फड़ (खरीदी केंद्र) खोले हैं। सुकमा में 2, नारायणपुर में 10 और दंतेवाड़ा जिले में 20 से अधिक नए स्थानों पर पहली बार खरीदी की तैयारी की गई है। अरनपुर, मिच्चीपारा और कोयलानपारा जैसे पूर्व नक्सल प्रभावित इलाकों में ग्रामीणों की मांग पर केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। दंतेवाड़ा में पहले 152 फड़ों के माध्यम से खरीदी होती थी, अब 10 से अधिक नए गांव इस व्यवस्था से जुड़ेंगे।
तेंदूपत्ता, जिसे बस्तर में ‘हरा सोना’ कहा जाता है, लंबे समय तक नक्सलियों की आय का प्रमुख स्रोत रहा है। हर गड्डी पर उनकी हिस्सेदारी तय रहती थी। लेकिन ठेकेदारी प्रथा खत्म कर सरकारी खरीदी लागू होने से यह व्यवस्था अब समाप्त हो गई है। अब भुगतान सीधे संग्राहकों के बैंक खातों में किया जाएगा, जिससे उन्हें पूरा लाभ मिलेगा और अवैध वसूली पर भी रोक लगेगी।
वन संरक्षक जगदलपुर वृत्त आलोक तिवारी के अनुसार, बस्तर के चार जिला यूनियनों में तेंदूपत्ता संग्रहण शुरू हो चुका है। 75 समितियों के माध्यम से लगभग 1310 फड़ों में संग्रहण किया जा रहा है। इस प्रक्रिया से करीब 1 लाख 90 हजार आदिवासी परिवारों को अतिरिक्त आय प्राप्त होने की उम्मीद है।



