अंबिकापुर। भोर की हल्की रोशनी अभी घने पेड़ों की काली छांव को चीर भी नहीं पाई थी कि खैरबार के पनिकापारा जंगल में मौत की सर्द सांसें फैल गईं। पक्षियों की चहचहाहट अचानक रुक गई। पेड़ों की सरसराहट भी जैसे डर के मारे थम सी गई। हवा में एक अजीब-सी खून की गंध घुली हुई थी, जो नाक में चुभ रही थी।
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महुआ और सूखी लकड़ी बीनने निकले ग्रामीण जब उस जगह पहुंचे, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वहाँ, सूखी पत्तियों पर एक चीतल का शव पड़ा था। पेट पूरी तरह से चीरा हुआ था। लाल-लाल आंतें बाहर निकली हुईं, कुछ हिस्से ज़मीन पर बिखरे पड़े थे। खून इतना बहा था कि आसपास की मिट्टी काली पड़ गई थी।
पिछले पैरों पर गहरे-गहरे नोंचने के निशान थे—जैसे कोई विशालकाय दरिंदा अपने तीखे पंजों से मांस को हड्डियों तक नोच-नोचकर खींचता रहा हो। गर्दन लगभग आधी कटी हुई थी, सिर एक तरफ़ लुढ़का पड़ा था। आँखें अभी भी खुली थीं—उनमें मौत का वो आखिरी आतंक जमा था, जैसे चीतल ने आखिरी सांस लेते वक्त भी अपने हत्यारे को देखा हो।
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यह चीतल कल रात तक शायद प्यास से तड़प रहा होगा। गर्मी के इस कहर में जंगल में पानी का एक-एक कतरा सूख चुका है। संजय पार्क में अभी 15 हिरणों की मौत का घाव भरा भी नहीं था कि यह नया शिकार सामने आ गया।
वन विभाग की टीम सूचना मिलते ही मौके पर पहुंची। उन्होंने लाश को देखा, फोटो खींचे और फिर सामान्य-सा बयान दे दिया — “कुत्तों के हमले की आशंका है।” पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार किए बिना ही चीतल का अंतिम संस्कार कर दिया गया। जैसे कोई मामूली घटना हो।
लेकिन सवाल यह है — आखिर क्यों बार-बार ऐसा हो रहा है?
सरगुजा के डीएफओ अभिषेक जोगावत ने कहा, “गर्मी में जानवर पानी की तलाश में बस्तियों की ओर आ जाते हैं, इसलिए कुत्ते उन्हें मार देते हैं। यह बयान सुनकर लगता है मानो वन विभाग का काम सिर्फ कारण बताना है, रोकना नहीं। अगर विभाग को पता है कि गर्मी में पानी की कमी से जानवर बस्ती की तरफ आते हैं, तो पिछले कई सालों से उन्होंने पानी के स्रोत क्यों नहीं बनाए? क्यों जंगलों में तालाब, चेकडैम और पानी के छेद नहीं खोदे गए? क्यों आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई?
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संजय पार्क में 15 हिरण मरे, अब पनिकापारा में एक चीतल। कल कोई और जानवर मरेगा। और विभाग हर बार वही पुराना गाना दोहराएगा — “गर्मी है, पानी नहीं है, कुत्ते हैं। वन्यजीव संरक्षण का दावा करने वाला विभाग असल में सिर्फ घटना के बाद पहुंचता है, रिपोर्ट लिखता है और लाश को जलाकर मामला खत्म कर देता है।
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जंगल में पानी का इंतजाम करना, आवारा कुत्तों को पकड़ना या उन्हें बाँधना, जंगली जानवरों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर बनाना ये सब काम उनके लिए बोझ लगते हैं। ग्रामीण चुपचाप देख रहे हैं। जंगल धीरे-धीरे खाली हो रहा है। एक-एक करके हिरण, चीतल, सांभर सब मर रहे हैं। और वन विभाग बस “आशंका” जता रहा है।
अब सवाल यह नहीं है कि चीतल की मौत कैसे हुई। सवाल यह है अगला शिकार कौन होगा? और वन विभाग कब तक सिर्फ बयानबाजी करता रहेगा, जबकि जंगल में मौत का सिलसिला लगातार जारी है? कि जिम्मेदार अधिकारी जवाब दें पानी कहाँ है? सुरक्षा कहाँ है? और सबसे बड़ा सवाल वन्यजीवों की जान की कीमत क्या है?



