स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से 20वीं सदी के उत्तरार्ध तक, भारत सुरक्षित अर्थव्यवस्था के अनुरूप कड़े नियंत्रित श्रम ढाँचे के तहत काम करता रहा। यहाँ तक कि उदारीकरण के बाद भी यह ऐसा क्षेत्र था, जिसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। इसका स्पष्ट परिणाम यह हुआ कि : श्रम-अधिशेष वाले देश में भी कंपनियाँ श्रम-प्रधान निवेश से बचती रहीं।
श्रम के व्यापक उपयोग में बाधा बन रहे श्रम कानून के इस असंतुलन को आखिरकार 2025 में सुधारा गया। अंतत: श्रम सुधारों और वीबी-जी राम जी के लागू होने से भारत के लिए अब यह संभव हो गया है कि वह शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में अपने श्रम अधिशेष को औपचारिक अर्थव्यवस्था में समाहित कर सके। श्रम कानून, सामाजिक सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार और उद्यम नीति पहली बार एक ही दिशा में काम कर रहे हैं। इसकी बदौलत भारत एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जो औपचारिक रोजगार तथा उद्यमों के विस्तार को सक्षम बनाते हुए श्रमिकों को भी सुरक्षा प्रदान करती है।
अन्य श्रम-अधिशेष अर्थव्यवस्थाओं से सीख
चलिए, उन देशों से शुरुआत करते हैं, जिन्होंने भारत जैसी ही चुनौती —श्रम के अधिशेष का सामना किया। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया ने श्रमिकों को बड़े पैमाने के विनिर्माण में समाहित करने के लिए भर्ती प्रक्रिया को पूर्वानुमेय और अनुपालन को प्रबंधनीय बनाते हुए श्रम कानून बनाए।
भारत ने इसके उलट रास्ता अपनाया। उसने अनुमतियों और जुर्मानों की एक जटिल भूलभुलैया खड़ी कर दी, जिसने श्रम-प्रधान निवेश को हतोत्साहित किया और कंपनियों को अनौपचारिकता की ओर धकेल दिया।
शहरी और ग्रामीण, दोनों श्रम बाज़ारों में रुख अब बदल गया है। भारत ने 29 श्रम क़ानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करते हुए अपने समकक्ष देशों की तुलना में अनुपालन को कहीं अधिक सरल बना दिया है। उसने अपने श्रमिक संरक्षण के स्तर को समकक्ष देशों के बराबर रखा है, और भर्ती में लचीलेपन के मामले में वह उनसे आगे बढ़ गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में, मनरेगा से विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) की दिशा में बदलाव ने रोजगार को उत्पादकता से जोड़ दिया है। इसमें बुआई और कटाई के चरम मौसम के दौरान 60 दिनों का विराम शामिल है, ताकि खेतिहर श्रमिकों की कमी न हो और कार्य को टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण से जोड़ा गया है। इसके परिणामस्वरूप एक ऐसी श्रम व्यवस्था बनी है, जो चीन, वियतनाम या इंडोनेशिया की तुलना में निवेश के लिए अधिक तैयार है, जिसमें कारखानों से लेकर खेतों तक पूरे श्रम तंत्र में अनुपालन में सुगमता, व्यापक सामाजिक सुरक्षा और बिना सुरक्षा मानकों को कमजोर किए बड़े पैमाने पर भर्ती की क्षमता मौजूद है।
श्रम सुधार: बिखराव से कार्यकुशलता की ओर
लगभग 100 श्रमिकों वाली एक छोटी विनिर्माण इकाई की कल्पना कीजिए। वर्षों तक, विकास के साथ चिंता भी जुड़ी रही। कुछ अतिरिक्त श्रमिकों को नियुक्त करने का मतलब था—श्रम कानूनों की जटिल भूलभुलैया से गुजरना, कई तरह के पंजीकरण कराना, मोटे-मोटे रजिस्टर बनाना, अलग-अलग प्राधिकरणों की निरीक्षण कार्रवाइयों का सामना करना, और इस बात का जोखिम उठाना कि कोई मामूली सी प्रक्रियागत चूक भी आपराधिक दायित्व को दावत दे सकती है। लिहाजा, कई व्यवसाय एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे: विस्तार करने की बजाय छोटा, अनौपचारिक और कम श्रमिकों के साथ बने रहना ही अधिक सुरक्षित है ।
यह मानसिकता 2025 में बदलनी शुरू हुई। 29 केंद्रीय श्रम क़ानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करने से व्यवस्था नियामकीय अव्यवस्था से निकलकर स्पष्टता की ओर बढ़ी। एकल पंजीकरण, लाइसेंस और रिटर्न के माध्यम से अनुपालन को सरल बनाया गया है; अब निरीक्षण दोष खोजने के बजाय सहयोग और सुविधा प्रदान करने लगे हैं; और सामान्य, रोज़मर्रा की त्रुटियाँ अब आपराधिक दंड को आमंत्रित नहीं करतीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सरलीकरण श्रमिक के अधिकारों की कीमत पर नहीं हुआ है। मज़दूरी संरक्षण को सार्वभौमिक बनाया गया है, लैंगिक समानता को क़ानून में अंतर्निहित किया गया है, सामाजिक सुरक्षा का दायरा गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों तक बढ़ाया गया है, और प्रवासी श्रमिकों को पोर्टेबिलिटी का लाभ मिला है। अब औपचारिक रूप से श्रमिकों को नियुक्त करना किसी जोखिम को संभालने जैसा नहीं, बल्कि भरोसे के साथ उठाया जाने वाला कदम बन गया है—जिससे विकास, सुरक्षा और विस्तार तीनों एक साथ संभव हो पाए हैं।
उद्यमों को बढ़ने और कर्मचारियों को नियुक्त करने में सक्षम बनाना
कई वर्षों तक, विकास करना ही अपने आप में एक प्रकार का दंड था। किसी विनिर्माण कंपनी की कल्पना कीजिए, जो बड़े पैमाने पर पहुँचने की कोशिश कर रही हो: जैसे ही उसकी चुकता पूँजी 4 करोड़ रुपये को पार करती थी, वह अपनी लघु कंपनी के दर्जे को खो देती और उसी समय अधिक श्रमिकों को नियुक्त करने की आवश्यकता के बीच अनिवार्य कैश-फ्लो स्टेटमेंट, अतिरिक्त बोर्ड और ऑडिट आवश्यकताएँ, और कंपनी रजिस्ट्रार के पास विस्तृत वार्षिक फाइलिंग —जैसे भारी अनुपालनों में उलझ जाती। इसका जवाब कई व्यवसायों ने आकार को सीमित रखकर, संचालन को विभाजित करके या अनौपचारिक बने रहकर दिया।
यह स्थिति 2025 में बदल गई। अब कंपनियाँ 10 करोड़ रुपये तक की चुकता पूँजी के साथ लघु कंपनी की श्रेणी में बनी रह सकती हैं, जबकि एमएसएमई निवेश सीमा 2.5 गुना और टर्नओवर सीमा 2 गुना बढ़ा दी गई है। विकास अब अनुपालन संबंधी आघात का कारण नहीं बनता; बल्कि औपचारिकीकरण, विस्तार और नई भर्ती के लिए अवसरों का सृजन करता है, जो उद्यम आधारित रोजगार सृजन को नियामकीय जोखिम के स्थान पर समझदारी भरा विकल्प बनाता है।
वर्षों तक, श्रम कानून औपचारिक भर्ती को हतोत्साहित करते रहे, क्योंकि नियोक्ता पूर्ववर्ती दायित्व, पिछली तिथियों के बकाया भुगतान, और यहाँ तक कि कर्मचारी के पूर्व नियोक्ता से जुड़ी चूक के लिए भी दंडात्मक हर्जाने के जोखिम के कारण अक्सर कर्मचारियों को भविष्य निधि में नामांकित करने से बचते थे।
इस अनिश्चितता ने औपचारिक रोजगार को जोखिमपूर्ण बना दिया था, जबकि कड़े निकासी नियमों के कारण कर्मचारी संकट के समय अपनी बचत तक पहुँच नहीं पाते थे। 2025 में यह स्थिति बदल गई, जब कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने पहले शामिल न किए गए श्रमिकों के लिए बिना पिछली देयताओं या जुर्माने के एक बार के नामांकन की अनुमति दी और निकासी प्रक्रिया को सरल बनाया। पात्रता अवधि 12 महीने मानकीकृत कर दिए जाने और कुल कोष का 75% तक निकालना संभव हो जाने से, इन सुधारों ने नियोक्ताओं के लिए भर्ती जोखिम कम कर दिया है और औपचारिकीकरण की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया।
ग्रामीण रोजगार: 2047 की अर्थव्यवस्था के लिए 2005 के ढाँचे को अद्यतन करना
2025 के दूसरे प्रमुख श्रम सुधार ने विपक्ष को गलत कारणों से गुस्से से भर दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि मनरेगा ने ग्रामीण आय बढ़ाने में मदद नहीं की, लेकिन यह भी स्पष्ट था कि इसने टिकाऊ परिसंपत्तियाँ नहीं बनाई और तेजी से बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल नहीं कायम किया।
2005 में जब यह योजना शुरू हुई थी, तो ग्रामीण भारत में 5 में से 2 से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे थे; आज यह संख्या 50 में से 2 से भी कम रह गई है—यानी इसमें दस गुना कमी आई है। साथ ही, मनरेगा के तहत किए जाने वाले कार्यों ने बुआई और कटाई के चरम मौसम में कृत्रिम श्रम संकट पैदा किया और किसानों की लागत बढ़ा दी। इन बदलावों ने इस सुधार को अनिवार्य बना दिया।
इस पृष्ठभूमि में, विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 एक निर्णायक पुनःस्थापना का प्रतिनिधित्व करता है। कानूनी गारंटी अब 125 दिनों तक बढ़ा दी गई है, लेकिन नए कानून में बुआई और कटाई के मौसम में 60 दिनों का विराम रखा गया है, ताकि किसानों की श्रम तक पहुँच सुनिश्चित हो सके। यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों का वास्तव में सृजन सुनिश्चित करते हुए जल सुरक्षा, मूलभूत ग्रामीण अवसंरचना, रोज़गार-संबंधी अवसंरचना और आपदा से होने वाली हानि को कम करने के उपायों जैसे चार प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित है। सभी निर्मित परिसंपत्तियाँ विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक में एकत्र की जाती हैं, जिससे संगठित और समन्वित राष्ट्रीय विकास रणनीति सुनिश्चित होती है।
स्वतंत्रता के बाद पहली बार, भारत की श्रम नीति अतीत को नियंत्रित करने के बजाय अब भविष्य को सक्षम बनाने लगी है। अब श्रम को एक समस्या के रूप में नहीं देखा जाता जिसे नियंत्रित करना है, बल्कि इसे विकास, सम्मान और राष्ट्रीय परिवर्तन में एक साथी के रूप में देखा जाता है।
(पीआईबी कार्यालय द्वारा जारी)



