रायपुर : छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने आदिवासियों से बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन आज भी 450 से अधिक आदिवासियों के जेलों में बंद होने का मुद्दा गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अब रिहाई की दिशा में ठोस कार्रवाई करने के बजाय नई-नई समितियों के गठन की बात सामने आ रही है।
सवाल यह है कि आखिर इन आदिवासियों को न्याय कब मिलेगा?
एक ओर बड़े नक्सली नेताओं के आत्मसमर्पण पर सरकार की ओर से स्वागत और सुविधाओं की चर्चा होती है, वहीं दूसरी ओर जेलों में बंद उन आदिवासियों की रिहाई के लिए ठोस पहल क्यों नहीं दिखाई दे रही, जिन्हें बेगुनाह बताया जा रहा है?
क्या समिति पर समिति बनाना ही सरकार की नीति बन गई है? आदिवासियों को न्याय और सम्मान के साथ जीने का अधिकार कब मिलेगा?
विकास उपाध्याय ने सरकार से मांग की कि जेलों में बंद आदिवासियों के मामलों की निष्पक्ष और समयबद्ध समीक्षा कराई जाए तथा जिनकी रिहाई कानूनन उचित हो, उन्हें तत्काल न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।




