पंकज विश्वकर्मा,
समाचार संपादक
रायपुर/छत्तीसगढ़. “खबर का असर” और “रायपुर न्यूज नेटवर्क एवं RNN24 डिजिटल न्यूज चैनल” की मुहिम रंग लाई। राजधानी रायपुर में न्यायालय तहसीलदार के एक फैसले में न्याय की जीत और ट्रस्ट माफियाओं की करारी हार हुई है। ग्राम सेवा समिति की बेशकीमती जमीन के फर्ज़ी तरीके से विनिमय और नामांतरण प्रकरण को न्यायालय ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है।
इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण विधि अनुरूप तथ्यों को अधिवक्ता महंत राम आशीष दास ने न्यायालय के समक्ष रखा। महंत राम आशीष दास द्वारा प्रस्तुत अकाट्य दस्तावेज़ी प्रमाण इस फैसले में नींव के पत्थर की भूमिका में रहे जिसे न्यायालय में नकारा नहीं जा सकता था। इस फैसले ने ट्रस्ट माफियाओं के करोड़ों के फर्जीवाड़े और सालों के मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

ट्रस्ट माफियाओं के सरगना अजय तिवारी, हरिवल्लभ अग्रवाल और भूमाफिया अखिलेश खटोड़ सहित इनके राजनैतिक आका वर्षों से राजधानी रायपुर के दर्जनों पब्लिक ट्रस्ट और सार्वजनिक न्यास संपत्तियों में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े को अंजाम दे कर करोड़ों रुपए की अफरातफरी कर रहे हैं। स्वतंत्रता सेनानीयों के द्वारा आजादी के बाद भारत के नवनिर्माण के लिए स्थापित ग्राम सेवा समिति हो या हिंदू धर्मावलंबियों की आस्था और विश्वास के लिए स्थापित जैतुसाव, नागरीदास या विरंचीनारायण मठ-मंदिर हो। इस सभी में इन लोगों ने बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े और गबन-घोटाले को अंजाम दिया है। इन ट्रस्ट माफियाओं ने सार्वजनिक न्यास की बेशकीमती जमीनों की अवैध खरीदी-बिक्री और चल संपत्तियों की हेरा-फेरी कर करोड़ों रुपए के व्यारे – न्यारे किए हैं।

“न्याय की जीत” का ये पूरा मामला राजधानी के सबसे बड़े व्यवसायिक क्षेत्र पंडरी तराई स्थित “ग्राम सेवा समिति” की बेशकीमती 10.38 एकड़ जमीन से जुड़ा हुआ है। आजादी के तुरंत बाद पूरे भारत के नवनिर्माण, ग्राम उत्थान, स्वदेशी और ग्रामीण रोज़गार मुखी विकास की अवधारणा का जो सपना था उसके लिए सब एक जुट होकर प्रयास कर रहे थे। तात्कालिक रायपुर और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानीयों ने भी इस दिशा में काम शुरू किया।
मंहत लक्ष्मीनारायण दास, नंदकुमार दानी, व्यंकटेशराव कोहाडे जैसे छत्तीसगढ़ के सपूतों ने 1948-49 में ग्राम सेवा समिति का गठन कर इस काम को आगे बढ़ाया। अंग्रेजों के 1860 में स्थापित कानून पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के अनुसार इसका पंजीयन भी कराया गया था। अब आप समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के उन सपूतों की दूरदर्शिता और ज्ञान को जो इस समिति को कानूनी अमलीजामा पहना कर पूरे कानूनी दायरे में लाकर सहकारिता की एक बहुत बड़ी मिसाल पेश की। 1965 में इस जमीन को समिति के सदस्यों ने 19 नये पैसे प्रति फुट के हिसाब से खरीद था।
इस सार्वजनिक न्यास संपत्ति को हड़पने के लिए स्वंभू ट्रस्टी अजय तिवारी, भूमाफिया हरिवल्लभ अग्रवाल उसके दलाल अखिलेश खटोड़ और इनके राजनैतिक आका द्वारा पिछले कुछ सालों से षड्यंत्र रचा जा रहा था।
यह भी पढ़ें – कोई भी भूमाफिया विष्णु देव सरकार में पैर नहीं पसारेगा यदि पसारेगा तो पैर काट दिया जायेगा : पुरंदर मिश्रा
राज्य के पुरोधाओं और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लोकहित में गठित “ग्राम सेवा समिति” की इस भूमि के फर्जी तरीके से अदला-बदली या यूं कहें कागजों में ट्रासंफर के एक बड़े खेल और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक न्यास की बेशकीमती जमीन की अफरातफरी की तैयारी थी। इस पब्लिक ट्रस्ट में कब्जा जमाने की कोशिश वर्षों से की जा रही है। इस ट्रस्ट में ट्रस्टी बनने के लिए अजय तिवारी द्वारा स्वयं सहित 7 व्यक्तियों का आवेदन पंजीयक सार्वजनिक न्यास को दिया गया था। जिसे तात्कालीन पंजीयक द्वारा अपने आदेश दिनांक 10/06/2024 को ही ख़ारिज कर दिया गया था।
यह भी पढ़ें – राजधानी में भूमाफियाओं की दरिंदगी और मानवीय सरोकार, संवेदना और संघर्ष की दास्तां….
इसके अलावा इस पब्लिक ट्रस्ट के एकमात्र जीवित सदस्य विशालराम चंद्राकर द्वारा मार्च 2025 को आवेदन प्रस्तुत कर ट्रस्ट को भंग करने का आवेदन भी प्रस्तुत किया था पंरतु उनकी मृत्यु हो जाने के कारण प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया गया। जिससे यह पता चलता है कि वर्तमान में ट्रस्ट में कोई भी ट्रस्टी नहीं है और पब्लिक ट्रस्ट होने की वजह से कलेक्टर रायपुर ही इसके पदेन अध्यक्ष है। पूरे ट्रस्ट पर कब्जा करने के लिए मास्टरमाइंड अजय तिवारी ने इस सार्वजनिक न्यास को रजिस्टर्ड सोसायटी का अमलीजामा पहनाने की तैयारियां की थी क्योंकि पब्लिक ट्रस्ट और रजिस्टर्ड सोसायटी के लिए अलग अलग कानूनी प्रावधान है।
दरअसल ग्राम सेवा समिति छत्तीसगढ़ लोक न्यास अधिनियम 1951 के तहत एक लोक न्यास के रूप में पंजीकृत ट्रस्ट है, इस ट्रस्ट की गतिविधियों के संचालन के लिए एक सहकारी समिति भी है। लोकन्यास पंजीकृत संस्था में न्यासी एवं जिला कलेक्टर/ पंजीयक सार्वजनिक न्यास होते हैं। अजय तिवारी द्वारा जानबूझकर यह तत्व छुपाया गया कि ग्राम सेवा समिति एक पब्लिक ट्रस्ट है। अजय तिवारी द्वारा फर्जी तरीके से यह साबित करने का प्रयास किया गया कि ग्राम सेवा समिति लोक न्यास नहीं बल्कि एक पंजीकृत संस्था है।
पब्लिक ट्रस्ट होने की वजह से भूमि के क्रय-विक्रय या अदला-बदली की अनुमति पंजीयक सार्वजनिक न्यास एवं पदेन अध्यक्ष कलेक्टर, रायपुर से लेनी चाहिए थी। पंरतु इन भूमाफियों ने अनुमति पंजीयक फर्म और सोसायटी से ली। जबकि इस सार्वजनिक न्यास के गठन कर्ता और तात्कालिक न्यास मंत्री नंद कुमार दानी ने वर्ष 1971 में पैसों की आवश्यकता होने पर तात्कालिक पंजीयक सार्वजनिक न्यास, रायपुर से बकायदा लिखित अनुमति ली थी। पचास के दशक में 19 पैसे वर्ग फीट की दर से खरीदी गई इस भूमि को 1971 में विक्रय करने के लिए दर 1रूपये 10 पैसा प्रशासन ने तय की थी। तात्कालिक रूप से भूमि विक्रय से करीब-करीब छः गुना लाभ प्राप्त हो रहा था।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए न्यायालय ने ग्राम सेवा समिति को सार्वजनिक न्यास मानते हुए और न्यास संपत्ति की इस बेशकीमती भूमि के विनिमय और नामांतरण को पंजीयक सार्वजनिक न्यास एवं कलेक्टर रायपुर, पदेन अध्यक्ष की अनुमति ना होने के कारण खारिज कर दिया है।
यह भी पढ़ें – राजधानी के तहसीलदार का केबिन बना भूमाफियों का अड्डा, शासन-प्रशासन ने सभी कर्मचारियों का किया तबादला
दरअसल ये पूरा मामला एक संगठित गिरोह द्वारा सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए गये एक अपराध का है। अब देखने वाली बात यह है कि शासन-प्रशासन इस आर्थिक अपराध, कूट रचना और फर्जीवाड़े पर अपराध कब पंजीबद्ध करता है…..?




