धमतरी। जिले के घने जंगलों में सुबह की धूप अभी पेड़ों के बीच बिखरी ही थी कि वहां एक क्रूर सन्नाटा छा गया। बांसीखाई बीट के कूप नंबर-121 में एक सुंदर नर नीलगाय धीरे-धीरे घास पर चर रहा था, उसे क्या पता था कि उसकी आखिरी सुबह होने वाली थी। अचानक, तीरों की बौछार ने उसकी शांत दुनिया को चीर दिया। गर्दन, पेट और पिछले हिस्सों में गहरे घाव, खून से लथपथ शरीर — यही दृश्य था, जो गश्ती दल के लिए जंगल में इंतजार कर रहा था।
वन विभाग की टीम जब मौके पर पहुँची, तो शिकारियों के कोई निशान नहीं मिले। लेकिन जंगल की सूंघने की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। खोजी कुत्ते ने तीरों की महक का पीछा किया और घने जंगल पार कर ग्राम डोकाल तक पहुँच गया, और वहीं एक घर के सामने जोर-जोर से भौंकने लगा।
घर के अंदर मन्नू और उसके पिता छिपे थे। पूछताछ में उन्होंने कबूल किया कि उन्होंने नीलगाय का शिकार किया है। फिर लगातार छापेमारी और जांच के बाद कुल 6-7 शिकारियों को हिरासत में लिया गया। वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई शुरू की।
लेकिन सवाल हवा में तैर रहे थे — इतना बड़ा शिकार दिनदहाड़े जंगल में कैसे हुआ? गश्त की लापरवाही, कमजोर निगरानी और सतर्कता की पूरी अनुपस्थिति ने शिकारियों को खुली छूट दे रखी थी।
और यह घटना अकेली नहीं थी।
जगदलपुर के इंद्रावती और बीजापुर के जंगलों में बाघ और तेंदुए तार के फंदों में फंसे हुए क्रूर मौत के इंतजार में थे। दंतेवाड़ा के डिप्टी रेंजर खुद शिकार गिरोह के साथ पकड़े गए।
सूरजपुर के गुरु घासीदास नेशनल पार्क में लकड़बग्घा घायल हालत में तड़पता रहा, लेकिन वन विभाग समय पर नहीं पहुँच सका।
सरगुजा के संजय वन जीव पार्क में आवारा कुत्तों ने 15 हिरणों को मार डाला जो कि बाड़ा खुला था।
जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के नाम पर जो दावा किया जाता है, वो सिर्फ कागजों और बयानबाज़ियों तक सीमित लगता है। नीलगाय तीरों से मारी जाती है, बाघ-तेंदुए फंदों में तड़पते हैं, और कभी-कभी वही रेंजर, जिन पर सुरक्षा की जिम्मेदारी है, शिकारियों के साथ मिलकर पकड़े जाते हैं।
अब सवाल यही है — क्या वन विभाग सिर्फ रिपोर्ट लिखता रहेगा और कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित रहेगा? या सच में जंगल की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे — जैसे गश्त बढ़ाना, कैमरा ट्रैप लगाना, स्टाफ की जवाबदेही तय करना और स्थानीय समुदायों में जागरूकता फैलाना? धमतरी के जंगल की चीख अब सिर्फ नीलगाय की नहीं, बल्कि हर उस वन्यजीव की है, जो इंसानों की लापरवाही और लालच का शिकार बनता है।



