रायपुर। प्रदेश में अब तक सरकारी स्तर पर निःशुल्क मिलने वाली फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) प्रक्रिया को निजी कंपनियों को सौंपे जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। नई व्यवस्था के तहत निजी एजेंसियां फायर ऑडिट के लिए 10 रुपए प्रति वर्गफीट तक शुल्क वसूल रही हैं, जिससे अस्पतालों, स्कूलों और अन्य संस्थानों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका है।
लाखों तक पहुंच रहा खर्च
नई दरों के अनुसार, 50 हजार वर्गफीट क्षेत्रफल वाले किसी अस्पताल या भवन को हर साल करीब 5 लाख रुपए तक सिर्फ फायर ऑडिट पर खर्च करने पड़ सकते हैं। छोटे संस्थानों के लिए भी यह राशि हजारों से लेकर लाखों रुपए तक पहुंच रही है, जिस पर संचालकों ने आपत्ति जताई है।
अस्पताल संचालकों में नाराजगी
अंबिकापुर के निजी अस्पताल संचालकों ने इस शुल्क को अव्यावहारिक बताया है। ओजस हॉस्पिटल के संचालक डॉ. नवीन द्विवेदी ने कहा कि 10 रुपए प्रति वर्गफीट की दर से शुल्क देना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने ऑडिट नहीं कराया। वहीं लेजर हॉस्पिटल के संचालक डॉ. योगेंद्र गहरवार ने इसे संस्थानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया।
रिंग रोड स्थित यशोदा हॉस्पिटल को बिलासपुर की एक कंपनी ने फायर ऑडिट के लिए 70,800 रुपए का बिल दिया, जिसमें 10,800 रुपए जीएसटी शामिल है। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि यह शुल्क अत्यधिक है।
पहले थी मुफ्त और पारदर्शी प्रक्रिया
पूर्व व्यवस्था में ऑनलाइन आवेदन के बाद जिला कमांडेंट की टीम मौके पर निरीक्षण कर मुख्यालय से एनओसी जारी करती थी, जो पूरी तरह निःशुल्क और पारदर्शी प्रक्रिया थी। अब वही कार्य निजी एजेंसियों के जरिए कराया जा रहा है, जिससे ऑडिट के नाम पर बड़ी राशि वसूली जा रही है।
सरगुजा में व्यापक असर
सरगुजा संभाग में मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल के अलावा 18 निजी अस्पताल, 24 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 193 उप स्वास्थ्य केंद्र, करीब 2365 स्कूल और 15 कॉलेज इस व्यवस्था से प्रभावित होंगे। इन सभी पर फायर ऑडिट के नाम पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा।
सरकार का पक्ष
गृह विभाग के प्रमुख सचिव मनोज कुमार पिंगुआ ने कहा कि पहले एनओसी प्रक्रिया निःशुल्क थी, जिससे सरकार को कोई आय नहीं होती थी। अब निजी कंपनियों के माध्यम से यह काम होने पर सरकार को फीस का एक हिस्सा मिलेगा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि शुल्क को लेकर शिकायतें मिल रही हैं और एजेंसियों द्वारा मनमानी किए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि यह सवाल अब भी बना हुआ है कि एनओसी मिलने के बाद यदि फायर सेफ्टी में कमी के कारण कोई हादसा होता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। इस पर प्रमुख सचिव ने स्पष्ट किया कि कंपनियों की भूमिका केवल ऑडिट तक सीमित है और समय-समय पर मॉनिटरिंग की जाएगी।



